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हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालिम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

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इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया

इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया
ख़ुद-ब-ख़ुद घबरा के क़दमों में ज़माना आ गया

 

जब ख़याल-ए-यार दिल में वालेहाना आ गया
लौट कर गुज़रा हुआ काफ़िर ज़माना आ गया

 

ख़ुश्क आँखें फीकी फीकी सी हँसी नज़रों में यास
कोई देखे अब मुझे आँसू बहाना आ गया

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हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है 

हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है
कोई तालिब कोई मतलूब नहीं होता है


अब तो पहली सी वह तहज़ीब की क़दरें न रहीं
अब किसी से कोई मरऊब नहीं होता है


अब गरज़ चारों तरफ पाँव पसारे है खड़ी
अब किसी का कोई महबूब नहीं होता है

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मेरा हुस्न-ए-नज़र है सब कुछ 

तेरा चेहरा न मेरा हुस्न-ए-नज़र है सब कुछ

हाँ मगर दर्द-ए-दिल-ए-ख़ाक-बसर है सब कुछ

 

मेरे ख़्वाबों से अलग मेरे सराबों से जुदा
इस मोहब्बत में कोई वहम मगर है सब कुछ

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हुस्न - ए - गुमराह

मुझ को मालूम है तू हुस्न में लासानी है
सारी दुनिया तेरी सौदाई है दीवानी है
तेरी आँखों में है कैफियत ए जाम ए मयनाब
सौ बहारों का है आईना तेरा हुस्न ए शबाब
रुख़ ए रंगीं से तेरे फूल भी शरमाते हैं
सामने आते हुए डरते हैं कतराते हैं
काली जुल्फें तेरी लहराती हैं जब शानों पर

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एक बेनाम महबूब के नाम

     
   
     

चाहता हूँ कि तेरा रूप मेरी चाह में हो

तेरी हर साँस मेरी साँस की पनाह में हो

 

मेरे महबूब तेरा ख़ुद का ज़िस्म न हो

मेरे एहसास की मूरत कोई तिलिस्म न हो

 

ढूँढता फिरता हूँ हर सिम्त भुला के ख़ुद को

अपनी पोशीदा रिहाइश का पता दे मुझको

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