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रोग, भोग और योग के आढ़तिये

रोग, भोग और योग के आढ़तिये

 -- प्रताप 

     
   
     

चारों तरफ़ गुरुओं की धूम मची है। हर विपणक के यहाँ योग से सम्बन्धित सामग्री बिक रही है। चारों ओर आढ़त का बाजार लगा है। लोग योग बेच रहे हैं  कुछ अन्य लोग योग खरीद रहे हैं। कोई आसन बेच रहा है, कोई अच्छे वाले आसन ईजाद कर रहा है। कोई ध्यान के सस्ते दाम लगा रहा है। किसी दुकान पर कुण्डलिनी उठवाई जा रही है। कुछ लोग प्राणायाम बेच रहे हैं। बता रहे हैं कि माल अच्छा है, साथ में गारन्टी दे रहे हैं कि मोटापा कम कर देगा। इस ध्यान- योग के बाजार में कुछ दुकानों पर एक्सेसरीज़ भी बिक रही है। ज्यादा भीड़ उन दुकानों पर है जहाँ एक्सेसरीज़ या तो हर्बल है या फिर उन्हें आयुर्वेद में से कहीं से आया बताया जा रहा है। पूरे बाजार  में चहल पहल है। चतुर सुजान, उत्तम वस्त्र पहनकर दुकानों के काउन्टर पर विराजे हुए हैं। मुद्राओं को रेशमी थैलियों में बन्द करके नीचे सरका रहे हैं। कुछ लोग वहाँ दूर शेड के नीचे बैठे हैं। बिल्कुल चुप । पूछा - कौन हैं ? पता चला - बुद्धिजीवी हैं।

सवाल हाट के अस्तित्त्व पर नहीं हैं। हाट को तो होना ही है, यहाँ नहीं होगा तो कहीं और होगा। जब तक क्रेता  का थैला और विक्रेता का बटुआ है, भिन्न भिन्न स्पेस टाईम में हाट अवतरित होता रहेगा। यह अनिवार्य है। सवाल दुकानों पर तथा माल पर भी नहीं हैं। हाट है तो अच्छा, भला, बुरा सभी तरह का माल भी सप्लाई होगा ही। वणिक नियमों के तहत् गंजों को भी कंघी बेचने के प्रयास तथा इन प्रयासों में सफलता-असफलता सभी कुछ होगा। कभी कंघी बिक जाएगी और कभी नहीं भी बिकेगी। कंघी के कारीगर, आढ़तिये सब अपना अपना हिस्सा कैलकुलेट करते रहेंगे। बाजार का व्यापार यूँ ही चलता रहेगा। व्यापार को यूँ चलाना बाजार की फ़ितरत है। फ़ितरत पर सवाल नहीं खड़े किये जा सकते हैं। सवाल तब उठते हैं जब कोई अपनी फ़ितरत के खिलाफ़ काम करता है। 

गंजे को कंघी बेचना वणिक चतुराई है। बाजार इस चतुराई की नींव पर ही खड़ा होता है। परन्तु बवासीर के रोगी को कंघी बेचना मैलप्रैक्टिस (महाठगी) है। ऐसे में बुद्धिजीवियों को उठ कर हस्तक्षेप करना चाहिये । ऐसे ठगों और ठगी के खिलाफ़ प्रतिरोध बुद्धिजीविय फ़ितरत है। आज का सवाल है कि अपनी फ़ितरत के बरख़िलाफ़ ये बुद्धिजीवी शेड के नीचे चुपचाप क्यों बैठे हैं। 

ढाई हजार वर्ष पूर्व जब पातंजलि ने योगसूत्र लिखा तो गीता के ज्ञान के बाद, ज्ञात मानवीय इतिहास की वह सबसे विलक्षण घटना थी। मानवीय इतिहास में मानव की भीतरी परतों के बारे में इतनी क्राँतिकारी बातें आधुनिक विज्ञान से पहले कभी नहीं लिखी गईं हैं। योग, प्राचीन साँख्य दर्शन  का व्यवहारिक पक्ष है। साँख्य ने जिस तत्त्व (मेटाफ़िज़िक्स) की चर्चा की उस की प्राप्ति का मार्ग योग में दे दिया गया है। साँख्य कहता है कि प्रकृति तीन मूल गुणों का सम्मिलन है। सृष्टि के समय जब तीनों गुण आपस क्रिया करते है तो सबसे पहले महत् अर्थात् बुद्धि का निर्माण होता है। उससे अहँकार और फिर मन बनते हैं। मन के बाद पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, रसना या जीभ और त्वक् या त्वचा) और फिर पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हाथ, पैर, जननेन्द्रिय, गुदा) विकसित होती हैं। विकास के अन्तिम चरण में पाँच तन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) और पाँच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) पैदा होते हैं। ये चौबीस तत्त्व (प्रकृति,महत्, अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ और पाँच महाभूत) पच्चीसवें पुरुष से मिलकर सृष्टि को रचते हैं। 

प्रकृति और उससे बने अन्य तत्त्व सब जड़ हैं। बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सब कुछ जड़ प्रकृति से निकले हैं, सब कुछ जड़ है। बुद्धि विकल्प सोच देती है, अहंकार से अपनापन (ममत्त्व) पैदा होता है। मन मूल्याँकन करता है और चेष्टाएँ पैदा करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ संवेदनाएँ इकट्ठी करती हैं। ठंड, दुख, कष्ट आदि की जानकारी देती हैं। कर्मेन्द्रियाँ काम कर देती हैं। दुख से दूर भगा ले जाती हैं सुख की ओर खींचती जाती हैं। सोचने से लेकर संवेदनाएँ प्राप्त करने तक, ममत्त्व बोध से लेकर उपभोग करने तक हर एक चरण में प्रकृति ही प्रकृति है। यह प्रकृति ही है जो बुद्धि, अहंकार और मन आदि अनेक रूपों में प्रकट हो रही है। प्रकृति ही अनुभव कर रही है, प्रकृति ही दुख का मूल्यांकन कर रही है, वही दुखों से दूर भागने के साधन जुटा रही है। सब कुछ प्रकृति कर रही है और प्रकृति में ही कर रही है। प्रकृति के लिए कर रही है। प्रकृति एक है परन्तु अनेक दिखाई पड़ रही है। प्रकृति के इसी अनेक रूप स्वाँग को आगे चलकर श्री शंकराचार्य ने माया कहा था। 

इस जगत् में पदार्थों के लिये जो ललक दिखाई पड़ती है जो आकर्षण महसूस होता है वह असलियत में कुछ जड़ पदार्थों (मन, अहंकार और बुद्धि आदि) का अन्य जड़ पदार्थों (संसार की भौतिक वस्तुओं) से सामान्य जुड़ाव है। चेतना का इससे कोई लेना देना नहीं है। प्रकृति (मन, अहंकार और बुद्धि)  ललक रही है, प्रकृति (पंच तन्मात्राओं और पंच महाभूतों) के लिये ललक रही है और प्रकृति (पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों) के ही सहारे उन्हें पाने में लगी हुयी है। सब चेष्टायें, विकार और प्राप्तियाँ सब प्रकृति में ही चल रहा है। इस सब में पुरुष का कहीं कोई रोल ही नहीं है। पुरुष कुछ नहीं करता है। करने के लिये जिन उपकरणों की जरूरत होती है वे पुरुष के पास नहीं हैं। वे सब उपकरण प्रकृति के हैं और प्रकृति ही उन्हें इस्तेमाल करती है। चेतन् पुरुष इस सबसे अलग है। 
योग बताता है कि किस प्रकार माया के आवरण को भेद कर पुरुष के सही स्वरूप में स्थित हुआ जाए। योग पुरुष के स्वरूप को जानने की बात नहीं करता है क्योंकि जानने के लिँए बुद्धि की जरूरत पड़ेगी और बुद्धि प्रकृति का उत्पाद मात्र होने के कारण प्रकृति से परे पुरुष तक नहीं पहुँच पाएगी। इसीलिए पातंजलि का योगसूत्र पुरुष के स्वरूप में स्थित होने की बात करता है। साँख्य योग ने स्वरूप में स्थिति के लिए अष्टाँगिक योग नामक एक टूल किट उपलब्ध करवाई है।  

मनुष्य जड़ प्रकृति और चेतन पुरुष का विशिष्ट संयोग है। मनष्य का शरीर, बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ आदि सब जड़ हैं और इन सबको चेतना से आप्लावित करता भीतर चेतन पुरुष है। जड़ को अपने विकास के लिये चेतना की जरूरत है और चेतन को अपनी अभिव्यक्ति के लिये जड़ शरीर की आवश्यकता है। सृष्टि के लिए दोनों साथ साथ ही अनिवार्य हैं। मनुष्य या सृष्टि के अन्य जीव इसीलिये विशिष्ट हैं कि जड़ और चेतन अलग अलग सत्ताएँ न होकर परस्पर बहुत सूक्ष्म ढंग से जुड़ी हुई हैं। जड़ और चेतन को जोड़ने वाला यह जो अतिसूक्ष्म सीमेंट है – प्राण कहलाता है। प्राण को सामान्य जन श्वास या साँस भी कहते हैं। यह प्राण बहुत अलग है। यह एक पुल जैसा है। ऐसा पुल जो प्रकृति और पुरुष को जोड़ता है। परन्तु दुनिया के सभी पुलों से अलग तरह का पुल है। सभी पुल नदी के दो समान किनारों को जोड़ते हैं। परन्तु प्राण सृष्टि के दो असमान किनारों को जोड़ता है। प्राण जड़ और चेतन को जोड़ता है। प्राण स्थूल और सूक्ष्म को जोड़ता है। प्राण विघटनशील और शाश्वत् को जोड़ता है। प्राण काल कवलित और कालातीत को जोड़ता है। यह नश्वर और अनश्वर को जोड़ता है। यह पदार्थ और अपदार्थ को जोड़ता है। यह दो नितान्त विपरीत और विरोधी सत्ताओं को जोड़ने वाला पुल है। ये दोनों सत्ताएँ  कभी जोड़ी नहीं जा सकती हैं परन्तु प्राण इन्हें फिर भी जोड़ता है इसीलिये प्राण को निरन्तर गतिशील बने रहना पड़ता है। प्राण की सतत् गतिशीलता  ही इसे दो विरोधियों को जोड़ने की ताकत देती है। 

प्राण जड़ और चेतन के बीच का संदेश वाहक भी है। जब यह भीतर जाता है तो भीतर के लिये बाहर का समाचार लाता है और जब भीतर से बाहर निकलता है तो बाहर को भीतर की ख़बर सुनाता है। केवल प्राण ही है जो इतने स्पष्ट तरीके से बाहर और भीतर को जोड़ता है। प्राण के अभाव में भीतर – बाहर, सूक्ष्म – स्थूल, अमर – मरणशील आदि का जुड़ाव हो पाने का उपाय नहीं था। प्राण इन्हें जोड़कर सृष्टि का निर्माण करता है। जब प्राण नहीं होता और इन सत्ताओं का जुड़ाव नहीं हो पाता तो उस अवस्था को प्रलय कहते हैं। सृष्टि जब भी रची जायेगी तो प्राण के बाद ही रची जायेगी। यह प्राण की महत्ता है। 

प्राण की इसी महत्ता के लिये योगसूत्र ने प्राण की साधना अर्थात प्राणायाम की बात की है। सामान्य जन के जीने का जो स्थूल स्तर है उस स्थूल स्तर से सूक्ष्म चेतन स्तर तक जाने के लिये केवल प्राण ही एक मात्र उपाय हो सकता है। इसलिये भी प्राण की साधना जरूरी है। प्राण की साधना को पातंजलि प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम की महत्ता बताते हुये पातंजलि कहते हैं – ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् (साधना पाद 52) अर्थात् उस (प्राणायाम) से प्रकाश का आवरण झीना हो जाता है। पातंजलि समझा रहे हैं कि यदि प्राणायाम को साध लें तो चेतन के प्रकाश की आभा मिलने लगती है। उस चेतना के ऊपर जड़ता का जो आवरण चढ़ा हुआ है वह क्षीण होकर गिरने लगता है। जीव अपने चैतन्य को प्राप्त करने लगता है। वह अपने स्वरुप में स्थिरता की ओर बढ़ चलता है।  

परन्तु आज परिस्थितियाँ तब के मुकाबले बदल गई हैं जब योगसूत्र रचा गया था । पातंजलि के सामने कैलोरी बर्न की समस्या नहीं थी जबकि आज की मुख्य समस्या ही कैलोरी बर्न की है। पातंजलि के साधक के सामने कुण्ठा और आत्मरोध की वह घातक स्थिति नहीं थी जो आज के मनुष्य के सामने बॉस की डांट, बच्चों के एडमिशन, पुलिस की हेकड़ी, काम के दबाव, गलाकाट कम्पीटीशन आदि ने पैदा कर दी है। आज एल्कोहलिकों की तर्ज़ पर वर्कोहलिक पैदा हो रहे हैं। ये सब पातंजलि और योगसूत्र के लिए अज्ञात थीं अतः योगसूत्र के भीतर इनका निदान भी संभव नहीं है।

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