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Vigyan Bhairav - The Gate

 विज्ञानभैरव – एक मुक्ति द्वार

                                                                                                           – प्रताप 

     
   
     

आज का समय सपनों का समय है। हर एक व्यक्ति ने एक स्वप्न पाल रखा है। वह व्यक्ति उस स्वप्न के पीछे पड़ा है। स्वप्न जागने और सोने के बीच का समय होता है। स्वप्न न तो पूरी तरह जागरण होता है और न पूरी तरह सुषुप्ति होता है। स्वप्न जागरण और सुषुप्ति का संक्रमण काल है। जागरण और सषुप्ति की सांध्यवेला को स्वप्न कहा गया है। यही स्वप्न की मोहकता है कि इसमें जागरण का यथार्थ और सुषुप्ति की मूर्छा दोनों नहीं हैं परन्तु जागरण की अनुभूति और सुषुप्ति की विश्रांति दोनों इसमें हैं। 

आज मनुष्य का मन व्यथित है । वह आराम नहीं कर पाता है। मोबाईल की घंटी बजकर नींद तोड़ देती है। न बजे तो भी नींद नहीं आती कि पता नहीं क्यों नहीं बज रही है, इतनी देर में तो बहुत बार बज जाया करती थी । न घंटी बजने से चैन है और न ही न बजने से ।मन दुविधा से भरा है । नींद आ भी गई तो सो नहीं पा रहा है। सोते समय भी दफ़्तर, टैंडर, काऊन्टर, बॉस, टारगेट सब मौजूद हैं। स्वप्न में माल का ऑर्डर भिजवाया जा रहा है। मुनीम का चेहरा दिखाई दे रहा है। नींद उचट रही है। निद्रा मे जागरण घुस गया है। जब सोते समय सो नहीं पाया तो जागते समय जाग भी नहीं पाता है। अधूरी नींद लिये टारगेट पूरा करने के लिये दौड़ पड़ता है। टारगेट सोने नहीं देता है, नींद जागने नहीं देती है। सब कुछ घालमेल हो जाता है। आज का मनुष्य न जागता है न सोता है। जागने और सोने के बीच का स्थान स्वप्न का है। आज का मनुष्य स्वप्न में जीवित है। परन्तु यह स्वप्न यथार्थ और मूर्छा वाला है चेतना और विश्राँति वाला नहीं है।

ज्ञानी जन कहते हैं कि यह बाजार का कमाल है। बाजार ने मनुष्य का चैन छीन लिया है। राम और आराम - दोनों बाजार में गुम हो गये हैं। बाजार जहाँ कम्पीटीशन है, चालबाजी है, फ़रेब है और माया है। बाजार में पलंग तो दिखाई देता है पर नींद नहीं दिखती। मनोरंजन की टिकट तो मिलती है पर सुकून नहीं मिलता । बाजार में भोजन और स्वाद तो उपलब्ध हैं परन्तु तृप्ति नहीं मिलती। वासना की दुकानें तो हैं पर प्रेम का कोई ठीया नहीं मिलता । नींद, सुकून, तृप्ति, प्रेम, भक्ति  – ये सब मनुष्य के लिये मनुष्य होने की शर्त हैं परन्तु ये सब बाजार में नहीं मिलते । सिर में राख डाले आज का मनुष्य इन्हें ढूँढता फिर रहा है। ढूँढ नहीं पाता है – यही उसकी समस्या है।

हल ढूँढने के दो रास्ते हैं। पहला योग का है जो कहता है कि बाजार छोड़ दो – आपको राम, आराम और शांति सब मिल जाएगा। विडम्बना है कि बाजार को छोड़ने का ‘काम सिखाने वाले’ अपनी अपनी दुकानें इसी बाजार में खोले बैठे हैं। किसी के काऊन्टर पर आसनों की तख्ती लगी है तो किसी के शो केस में प्राणायाम  के कसरती रूप सजे धरे हैं।

दूसरा रास्ता बाजार से होकर जाता है। यह भैरव तंत्र का रास्ता है । आधुनिक विज्ञान इसे समझने में मदद कर सकता है। इसे समझने से पहले इसकी कार्यविधि समझनी जरूरी है। विज्ञान के अनुसार अस्तित्त्व द्विध्रुवीय (Bipolar) है। यहाँ कण है तो उसका प्रतिकण भी है। मैटर है तो एण्टीमैटर भी है। समस्त अस्तित्त्व को लील सकने वाला ब्लैक होल है तो अस्तित्त्व की उत्पत्ति करने वाला व्हाईट होल भी है। यहाँ भाव और अभाव का, मैटर और एण्टीमैटर का, प्रकाश और अँधकार का, धर्म और अधर्म का, पाप और पुण्य का साथ साथ अस्तित्त्व है। अस्तित्त्व और अनस्तित्त्व इस जगत में दोनों एक साथ हैं। विज्ञान कहता है कि यदि सारा अस्तित्त्व होल के एक सिरे (ब्लैक) पर अनस्तित्त्व हो जाता है तो होल के ही दूसरे सिरे (व्हाईट) पर अनस्तित्त्व से अस्तित्त्व भी उद्भूत होगा। ऐसा होता भी है। भैरव तंत्र कहता है कि यदि मनुष्य का स्व बाजार में कहीं विलीन हो गया है तो बाजार में ही वह अवतरित भी होगा। जागृति यदि बाजार में गुम हुई है तो बाजार ही उसे ढूँढने का उपाय भी होगा।

भैरव तंत्र के अनुसार जिस किसी चीज का अतिक्रमण करना है उस चीज के माध्यम से ही ऐसा हो पाएगा। भय है तो भय से भागकर या बचकर नहीं भय का सामना करने से ही भय का निवारण हो पाएगा। माँस, मदिरा, मत्स्य, मैथुन सबसे अधिक आकर्षक हैं। बहुत जल्दी भरमाते हैं। इनसे से बचना है तो इनसे भाग कर नहीं बच सकते इनका अतिक्रमण करना होगा। इनके बीच से गुजर कर जाना होगा। जब आप इन्हें देख लेंगे, इन्हें जान लेंगे तो फिर ये आपको भरमा नहीं पायेंगे। ये आकर्षण इसीलिये भरम पैदा करते हैं कि लोग सोये सोये ही इनमें उलझे रहते हैं। जिस दिन जागकर इन्हें जान लिया उसी दिन से इन आकर्षणों का अर्थ समाप्त हो जाता है। ये आकर्षण अर्थहीन हो जाते हैं। ये आकर्षित करना छोड़ देते हैं। 

भैरव तंत्र ने अनेक उपाय सुझाये हैं। ये सारे उपाय बाजार की उन्हीं गलियों से गुजरते हैं जहाँ आपका आपा खो गया था। उदाहरण के लिए कुछ रास्तों के नाम हैं – मायीव प्रयोग (फ़िल्म, जादू के करतब, तमाशा आदि), भोजन, पान, मित्र – मिलाप, प्रेम – प्रसंग, गाड़ी की सवारी, संगीत सुनते समय आदि । ध्यान रहे ये ही कारण हैं जिनके कारण लोगों का मन पागल हुआ भागा फिरता है। भैरव तंत्र कहता है कि ये ही रास्ते आपको भैरवी अवस्था तक पहुँचा सकते हैं जहाँ पातँजलि आपको अष्टाँग योग से ले जाना चाहते हैं। भैरव तंत्र के रास्ते से लाभ यह होगा कि आपको बाजार भी नहीं त्यागना पड़ेगा और आप बाजार में योग की दुकान सजाये बैठे आढ़तियों से भी बच जाएँगे।

भैरव तंत्र के प्रारम्भ में ही देवी शिव से पूछती हैं - हे शिव, आपका सत्य क्या है? यह विस्मय भरा विश्व क्या है? इसका बीज क्या है? विश्व चक्र की धुरी क्या है? रूपों पर छाए लेकिन रूप के परे जाकर हम इसमें कैसे पूर्णतः प्रवेश करें? मेरे संशय निर्मूल करें। 

इसके उत्तर में शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से भैरवी अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। इन 112 विधियों की चर्चा से पूर्व भैरवी अवस्था को समझना श्रेयस्कर होगा। 

इसके लिए विज्ञान भैरव की14 वीं और15 वीं कारिकाओं में शिव कहते हैं –


दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी ।

व्युपदेष्टुमशक्यासावकथ्या  परमार्थतः ।। 14 ।। 

अन्तः स्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्त गोचरा ।

यावस्था भरिताकारा भैरवी  भैरवात्मनः  ।। 15 ।। 

अर्थात   दिशा और काल के व्यापार से मुक्त , दूर या समीप के भेद से रहित, प्रतिपादन के अयोग्य यह तत्त्वतः अनिर्वचनीय है। वास्तव में भीतर ही भीतर अपने अनुभव मात्र से आनन्द देने वाली और संकल्प विकल्प से मुक्त होकर अनुभूत होने वाली जो परिपूर्ण आकार वाली अवस्था है वही भैरवी शक्ति है। 

भैरवी शक्ति को स्पष्ट करने के बाद शिव एकदम से भैरवी शक्ति को प्राप्त करने की विधियों को उल्लेख नहीं करते हैं अपितु थोड़ा रुक कर देवी को आगाह करते हैं। ऐसा लगता है कि शिव आजकल की कॉर्पोरेट टेण्डेन्सीज़ को पहले से ही जान पा रहे हैं उन्हें पता है कि ये विधियाँ बहुत जल्दी नए रैपरों में लपेट कर योग की दुकानों में गेरुआवस्त्र धारी सेल्समैनों द्वारा बेची जाएँगी। इसीलिए वे 19 वीं कारिका में कहते हैं

न वह्नेर्दाहिका शक्तिव् र्यतिरिक्ता विभाव्यते  ।

केवलं ज्ञानसत्तायां  प्रारम्भोदयं   प्रवेशने  ।। 19 ।। 

कि अग्नि  की दाह्य शक्ति अग्नि से अलग कुछ नहीं है। ज्ञान प्रारम्भ करने के लिए प्रवेश द्वार के रूप तक तो ठीक है

मेरे मन्तव्य के अनुसार, शिव यहाँ अस्तित्त्व और ज्ञान के द्वैत को दिखा और समझा रहे हैं। उनके अनुसार ज्ञान और अस्तित्त्व अनिवार्यतः एक ही नहीं हैं। ज्ञान एक कामचलाऊ अवधारणा भर है। ज्ञान मात्र से अस्तित्त्व के बारे में दिया गया वक्तव्य बहुत प्रमाणिक नहीं हो सकता है। विषय में प्रवेश करवा देने के बाद ज्ञान का मूल्य रद्दी के गट्ठर से अधिक शायद ही रह पाता हो।

खैर आगे बात करते हैं। कुछेक अन्य मौलिक अवधारणाओं को स्पष्ट करने के बाद शिव उन विधियों को उल्लेख करते हैं जो साधक को भैरवी शक्ति में स्थित करा सकती हैं। शिव के पूरे उवाच और उसकी सम्पूर्ण व्याख्या एक छोटे लेख में नहीं की जा सकती है अतः एकाध विधियों पर ही चर्चा सीमित रखेंगे।

32 वीं कारिका कहती हैः

शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपंचकम्  ।

ध्यायतोनुत्तरे   शून्ये   प्रवेशो  हृदये   भवेत्  ।।32 ।। 

रंगीन मोरपंखों की तरह मण्डलों  (इन्द्रियों या तन्मात्राओं) को पंचक शून्य मानकर हृदय में ध्यान करते हुए  (योगी) का प्रवेश अनुत्तर शून्य में होता है। 

मोर पंखों में रंगीन वर्तुल होते हैं। मोहक होते हैं। मनभावन होते हैं। आपकी पाँच इन्द्रियाँ ( आँख, नाक, कान, रसना और त्वचा) हैं और इन पाँच इन्द्रियों से सम्बन्धित पाँच तन्मात्राएँ ( रूप, गंध, शब्द, रस और स्पर्श ) हैं। इनमें ही स्थित हो जाओ। इनसे भागो मत। इनमें स्थित हो जाओ। इन से भाग कर आप जा नहीं पाएँगे। इनसे भागने का कोई उपाय नहीं है। जहाँ भी भाग कर जाओगे आपके आँख, नाक, कान, जीभ और खाल वहीं वहीं चली जाएगी। आप इन इन्द्रियों के बिना भाग ना पाओगे। ये आपके अटूट हिस्से हैं। इनमें स्थित हो जाओ। इन्हीं में विसर्जित हो जाओ।

प्रश्न किया जा सकता है कि इनमें तो हम पहले से ही उपस्थित हैं । आँख से देख रहे हैं, कानों से सुन रहें हैं आदि आदि। हम इन्हीं में उपस्थित हैं । हम इनमें पहले से ही उपस्थित हैं। और जब पहले से उपस्थित हैं तो फिर भैरवी शक्ति क्यों उदय नहीं हुई।

शिव कहते हैं – ऐसे नहीं। आप खा रहे हैं। आपके जबड़े गति कर रहे हैं परन्तु आँख घड़ी पर टिकी है। लन्च के एक घन्टे का कितना भाग पूरा हो चुका है और कितना शेष है, आपका मस्तिष्क इसकी गणना में लगा है। दिमाग में विचार चल रहा है कि लंच के एकदम बाद मि. शर्मा से मीटिंग है और अमुक अमुक विषय एजेण्डे में शामिल करने से रह गए हैं। बहुत मुश्किल है। अनेकों कठिनाईयाँ हैं। गाना बजा दिया है हल्का हल्का। ताकि मन लगा रहे। लेकिन गाने में भी मन नहीं लगता है। वही दो चार गाने हैं रेडियो वालों के पास, उन्हें ही घुमा फिरा कर बजाते रहते हैं। हाथ रोटी तोड़कर मुँह में डाल देते हैं। मुँह चलता रहता है। भोजन पेट में ठूँसा जा रहा है। हाथ, जबड़ा, जीभ, कान, मस्तिष्क सब चल रहे हैं। भोजन किया जा रहा है।

शिव कहते हैं -  ऐसे नहीं। आपकी इन्द्रियाँ गतिशील हैं परन्तु आप किसी भी इन्द्रिय की गति में उपस्थित नहीं हैं। पावलॉव ने कुछ जानवरों पर प्रयोग किए थे। वे जानवरों को पहले एक घन्टी की आवाज सुनाते थे और फिर उनके सामने खाना रख देते थे। खाने को देखकर जानवर के मुँह में लार आ जाती थी। पावलॉव ने लम्बे समय तक प्रयोग दोहराया। एक समय ऐसा आया कि जानवर के मुँह में लार पैदा करने के लिए खाने की आवश्यकता न रही। जैसे ही पावलॉव ने घन्टी बजाई तो जानवर के मुँह में लार आ गई। जानवर की लार, खाने की बजाय घन्टी की आवाज़ के साथ कन्डीशन हो गई। बिल्कुल यन्त्रवत् । सोचने विचारने का कोई आधार अब जरूरी नहीं रहा। घन्टी की आवाज़ हुई और जानवर के मुँह में लार पैदा हो गई। यन्त्रवत् ।

शिव कहते हैं – ऐसे नहीं। भोजन के समय आपका मुँह, कान, मस्तिष्क सब चल रहा है। सब यन्त्रवत् चल रहा है। मुँह, आँख, कान, मस्तिष्क सब चल रहे हैं पर उन्हें चलाने वाला सोया हुआ है। सब नींद में चल रहा है।

शिव कहते हैं – ऐसे नहीं। जाग जाओ। शिव आपको जगा रहे हैं। इन्द्रियाँ आपके अस्तित्त्व का हिस्सा हैं। शिव आपको उनके उपयोग से आपको रोक नहीं रहे हैं केवल जगा रहे हैं। जब आप सामान्य अवस्था में देख रहे हैं तो देखना आपके लिए अस्तित्त्व की एक अवस्था नहीं है महज़ एक एक्सीडेन्ट है। वस्तु आँख के सामने आई उसकी परछाई लेंस पर बनी वह दिखाई दी और बात आई गई हो गई। सारी प्रकिया केवल एक दृश्य बन कर रह गया और गुजर गया। यन्त्रवत् । दर्शक कहीं नहीं आया। जो देखने वाला था वह कहीं नहीं था और घटना समाप्त हो गई।

शिव कहते हैं – ऐसे नहीं। जब देखो तो देखना बन जाओ। सुनो तो सुनना बन जाओ। जाग कर देखो कि देखा जा रहा है। जाग कर सुनो कि सुना जा रहा है। जाग कर सूँघो कि सूँघा जा रहा है। शिव जागरण का आह्वान कर रहे हैं। शिव कहते हैं जाग कर अपनी इन्द्रियों के मण्डल में खो जाओ। सोते हुए मत देखो। सोते हुए मत सुनो। आदि आदि। सोते हुए देखोगे तो दृश्य तो रहेगा पर दर्शक का स्थान खो जाएगा। दर्शक के होने का कोई उपाय न बचेगा। शिव कहते दृश्य यन्त्रवत् है, दर्शक नहीं। दर्शक चेतन हैं। शिव दर्शक को जगाते हैं। शिव चैतन्य की बात करते हैं।

शिव कहते हैं -  रंगीन मोरपंखों की तरह मण्डलों  (इन्द्रियों या तन्मात्राओं) को पंचक शून्य मानो। मोर पंखों की तरह इन पंचेन्द्रियों या पंच तन्मात्राओं को शून्य मानो। शिव इतने बड़े ज्ञानी हैं तो भी केवल शून्य पर ही क्यों जोर देते हैं। कोई बड़ी सी संख्या कहते तो अच्छा रहता पर वह तो केवल शून्य की बात करते हैं। शून्य – रिक्त होता है। उसमें कुछ भरा हुआ नहीं होता है। शून्य केवल शून्य होता है। गुण, अवगुण, प्रेयस्, श्रेयस्, तृष्णा, वैराग्य, लघु, दीर्घ इन सबसे दूर इन सबसे रिक्त होता है शून्य। 

शिव कहते हैं – मण्डलों को शून्य मानो । जब आप देखते हो तो देखने पर भी आप वर्तमान दृश्यों के ऊपर अपने पुराने अनुभवों का आरोपण कर देते हो। देखो तो इस बालक की नाक बिल्कुल रमेश के जैसी है। यह रंग तो चिन्टू के स्वेटर जैसा है। ऐसे पुराने पत्थर तो मैंने पुष्कर के पहाड़ों मे ही देखे हैं। आपकी आँख ही नहीं देख रही है बल्कि आपका मस्तिष्क भी साथ साथ मूल्यांकन कर रहा है। परन्तु न आँख को देखने का पता चल पाता है और न ही मस्तिष्क को मूल्याँकन का। सब कुछ होता रहता है। बिना किसी सचेष्टा के। कहीं कोई चैतन्य तत्त्व नहीं आ पाता है।

शिव कहते हैं – मण्डलों को शून्य मानो । शिव कहते हैं आरोपण मत करो। आरोपण से दृश्य शुद्ध नहीं रह पाएगा। आरोपण एक बाधा है। यह कृत्रिम है। यह दृश्य की सही संवेदना को दर्शक तक पहुँचने से रोकती है। जो संवेदना विषय से चलनी शुरु हुई थी वह जस की तस चित्त तक नहीं पहुँची। पुराने अनुभवों के आरोप ने उसे मैला कर दिया। दर्शक को जो दृश्य उपस्थित हो सकता था पिछले अनुभवों के आरोप ने उसे उस दृश्य से वंचित कर दिया। 

शिव कहते हैं – मण्डलों को शून्य मानो ।  आरोप न करो । इन्द्रियसंवेदन को जस का तस पाओ। शून्य से शुरु करो।

शिव कहते हैं – अब इसके बाद हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। हृदय में ध्यान की विशिष्टता है। भ्रूमध्य में नहीं, मूलाधार में नहीं, मध्यनाड़ी में नहीं, शिव कहते हैं – हृदय  में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। इससे पूर्व में 24 वीं कारिका में शिव कहते हैं कि हृदय से द्वादशांत तक चलने वाली ऊर्ध्व वायु प्राण है और द्वादशाँत से हृदय तक चलने वाली अधो वायु अपान है। शिव कहते हैं कि हृदय प्राण की उत्पत्ति का स्थान है। यहाँ प्राण और अपान का मिलन होता है। हृदय अस्तित्त्व का आधार स्थान है।

शिव कहते हैं – हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। मस्तिष्क बुद्धि का उपकरण है। मस्तिष्क सोचने विचारने की टूल किट है। बुद्धि सोचने और विचारने के बाद संकल्प और विकल्प सुझा देती है। बुद्धि विकल्पात्मिका है। यह ऑप्शन्स उपलब्ध करवा देती है। लेकिन इसमें भी एक बारीक पेंच छिपा है। यह जरा देखने समझने की बात है कि बुद्धि के विकल्प वास्तव में क्या होते हैं। बुद्धि का सारा डेटा सोर्स वह अनुभव होता है जो मन ने इन्द्रियों की सहायता से इकट्ठा किया था । बुद्धि उसी सारे अनुभव को या तो पुनर्व्यवस्थित करती है या फिर नई परम्यूटेशन और कॉम्बीनेशन के आधार पर कुछ नए प्रकार के गठजोड़ से गढ़ देती है। बुद्धि के पास नवीनता के नाम पर इस नई परम्यूटेशन और कॉम्बीनेशन के अलावा कुछ नहीं होता है। पुराने माल की नई पैकिंग जैसा ही कुछ ।

शिव कहते हैं – हृदय में ध्यान करने से योगी शून्य में प्रवेश करता है। अन्य स्थान में ध्यान करने से कोई प्राप्ति नहीं है। योगी के द्वारा अनुभव जन्य ज्ञान का अतिक्रमण कर जाने के बाद पुनः उसी अनुभव के जाल में फँस जाने की बात शिव नहीं कर सकते हैं। इसीलिए शिव हृदय में ध्यान करवाते हैं।

शिव कहते हैं – योगी शून्य में प्रवेश करता है। नागसेन बहुत बड़े बौद्ध आचार्य हुए हैं। एक बार राजा मिलिन्द ने उनसे पूछा था – भन्ते कुछ लोग कहते हैं कि संसार है, कुछ अन्य लोग कहते हैं कि संसार नहीं है बस प्रतीति है। कुछ लोग कहते हैं कि संसार ऐसा है तो अन्य लोग संसार को कुछ अन्य तरह का बताते हैं। ऐसी ही बातें आत्मा, ईश्वर आदि के बारे में भी कही जाती हैं। भगवन कृपया मेरी शंका का निवारण करें। मुझे इनका स्वरूप बतायें । नागसेन ने कहा – राजन् , संसार का अस्तित्त्व है – ऐसा कहना नितांत सही नहीं होगा। क्योंकि अगर संसार का अस्तित्त्व है तो मृत्यु जैसी अनस्तित्त्वमूलक घटनाओं का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता है। जिसका अस्तित्त्व है उसका अनस्तित्त्व नहीं हो सकता। राजन ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि संसार का कोई अस्तित्त्व नहीं है। नियमित रूप से जन्म आदि घटनाएँ देखने में आती हैं। अनस्तित्त्वमान संसार का नियमित रूप से अस्तित्त्व में आते रहने को समझाया नहीं जा सकता है। साथ ही ऐसा भी कहना युक्तिसंगत नहीं है कि यह अनस्तित्त्वमान सत्ताओं का अस्तित्त्व है या अस्तित्त्वमान सत्ताओं का अनस्तित्त्व है। अन्तिम दोनों स्थितियाँ स्वतः व्याघाती self contradictory हैं। तब राजा मिलिन्द ने फिर पूछा कि प्रभु तब यह सब क्या है.  नागसेन ने कहा -  राजन यह अनिर्वचनीय है। इसे बोलकर नहीं बताया जा सकता है।

शिव कहते हैं – योगी शून्य में प्रवेश करता है। शून्य अनिर्वचनीय है। आपकी वह सारी पूंजी जिसे आप ज्ञान कहते हैं मूलतः आपकी इन्द्रियों के द्वारा इकट्ठा किया गया अनुभव है। आपकी आँखों ने जो देखा, कानों ने जो सुना, रसना ने जो चखा, नाक ने जो सूँघा या त्वचा ने जो छुआ उससे अलग आप किसी चीज का विश्लेषण नहीं कर सकते। हालाँकि एक ऐसी चीज की कल्पना की जा सकती है जो हाथी की तरह चले जिसकी पूँछ हैलीकॉप्टर जैसी हो और जो बाज की तरह उड़ सके। ऐसी चीज हालाँकि दुनिया में नहीं है पर इसके जो विभिन्न गुण आप सोचते हैं वे सभी दुनिया में पाई जाने वाली उन दूसरी चीजों से लिए गए हैं जिनके अनुभव आपकी इन्द्रियाँ पहले कर चुकी हैं। आपकी बुद्धि और इस प्रकार आपकी सारी सोच आपके अनुभव से परे नहीं जा पाती है। आपकी भाषा में वे ही शब्द हैं जो आपके अनुभव को व्यक्त करते हैं। आपकी भाषा आपके अनुभव से परे नहीं जा सकती । यही भाषा की सीमा है। जो आपने अनुभव नहीं किया है उसे आपकी भाषा व्यक्त नहीं कर सकती है। वह आपके लिए अनिर्वचनीय है। आप उसका कुछ वर्णन नहीं जानते हैं। वह शून्य है।

शिव कहते हैं कि कहीं कन्दराओं में मत जाओ। वहाँ भी कम से कम आप खुद तो होंगें ही। आप संसार से कट कर कहीं नहीं जा सकते। संसार से कटना कोई मार्ग है भी नहीं। यहीं मुक्त हो जाओ। मोक्ष पा जाओ। कन्दराओं में मोक्ष होता तो वहाँ की शिलाँए पहले ही मोक्ष पा चुकी होतीं। आपके जाने के लिए स्थान न बचता। मोक्ष कन्दराओं में नहीं छिपा है। मोक्ष आपमें ही छिपा है। अपितु आप ही मोक्ष हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे की आप ही बन्धन भी हैं। मोक्ष बाहर से आयातित कोई वस्तु नहीं है। आपकी जागृति ही है। सिर्फ़ जाग जाओ।

 

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