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उदासी Sadness

उदासी

उदासी जितनी गहरी होगी उसे दूर करने के लिये उतने बड़े आयोजन को करना होगा। 1970 के दशक में एक चुटकुला सुनाया जाता था। पिता पुत्र से कहता है – बेटा जा पान ले आ। पुत्र जवाब देता है कि जापान तो बहुत बड़ा है उसे मैं कैसे ला सकता हूँ। उस चुटकुले पर मैंने तब लोगों को बहुत ठहाके लगाते देखा है। तब उदासी उतनी नहीं गहराई थी। कम प्रयास करने से ही हास्य फूट जाता था। होंठ मुस्कुरा उठते थे। फिर उदास होने का सिलसिला चल निकला।

सामान्य से चुटकुले पर हँसने का उपाय नहीं रहा। अपने आप तो हँसी अब आती नहीं है। अब हँसी के लिये भी कोशिश करनी होती है। भव्य सैट लगाने पड़ते हैं, कार्यक्रम आयोजित करने पड़ते हैं। जितना बड़ा सैट होगा लोगबाग उतना उदासी दूर कर पाएँगे। व्यक्तिगत उदासी के लिये फेबु है, व्हाटस्एप है। उनसे व्यक्तिगत उदासी दूर होगी। कानों में गानों की आवाज़ आती रहनी चाहिये। ताकि मन लगा रहे और उदासी की कोई झपकी भी आपको छू ना जाए।

 

उदासी दूर करने के लिये पूरी Entertainment Industry खड़ी हो गई है। वहाँ के कलाकार उदास चित्तों के और उदास मनों के Celebrities बन गए हैं। समाज में उदासी जितनी अधिक विस्तृत होगी वहाँ मनोरंजन करने वाले कलाकार उतने ही अधिक पूजनीय होंगे। इसमें कलाकारों का कोई दोष नहीं है। उनकी कोई गलती नहीं है वे तो बस अपना काम कर रहे हैं। यह तो उदास चित्त हैं जो मनोरंजन में दिव्यता और कलाकार देवत्व ढूँढता है।

जितना जितना आप उदासी में गहरे गिरते हो आपका समाज आपको उतने उतने एप्स थमा देता है। बीस साल पहले Printed Material होता था, magazines होती थीं, फोटोग्राफ्स होते थे। आज Electronic Material हो गया है। Appearance बदल गई है। लेकिन सामग्री वही है। अब internet, whatsapp, FB और दूसरी वेबसाईट्स पर है। हर चीज आपको बिजी रखने के लिये रची गई है। जब तक उसमें रमे रहते हो उदासी याद नहीं आती। मन उधर खिंचा रहता है। 

लेकिन जैसे ही आयोजन से, internet से, whatsapp से, FB से हटते हो फिर उदासी से घिरने लगते हो। कुछ लोग तब शराब का सहारा लेते हैं। शराब भी आपको इन्हीं एप्स के जैसे आपके उदास मन से दूर करती है। यह आपको केन्द्र से उठाकर बाहर परिधि की तरफ उछाल देती है। आपको आपके केन्द्र पर जाने से रोकती है। यह शराब वही सब कुछ करती है जो शराब के बाहर आपके एप्स कर रहे थे। आपको आपके केन्द्र पर नहीं जाने दे रहे थे।

इन सब से जूझ कर आप आखिर में किसी गुरू की शरण में पहुँचते हैं। वह आपको अपना नाम थमा देते हैं। एक और नया एप। अब आप इस नाम में लिपट गए। हर शै आपको आपकी बाहरी परिधि पर रोक कर रखना चाहती है।

यही गड़बड़ है। कभी ध्यान से अपनी प्रकृति को देखो। बस बैठ भर जाओ। सब अपने आप उजागर हो जाएगा। कहीं जाने की जरूरत ना होगी। उदासी को समझ जाना है। खुद को समझ जाना है। उदासी गहरी बात है। उदास होने पर आप सिमट जाते हो। आपका पूरा व्यक्तित्व भीतर की गति करता है। दुनिया से मिलना छोड़ देते हो। दोस्तों के पास नहीं जाते हो। उदास होने पर यह क्या घटित हो गया है कि अब पार्टी में जाना नहीं सुहाता। टीवी देखना नहीं सुहाता। बस चुप होने, तन्हा बैठने को और कई बार रोने को जी चाहता है। फूट फूट कर रो देने का मन करता है।

थोड़ा समझ लेना होगा। सारा दिन थक हार के जब सोते हो तो सुबह ऊर्जा से भरपूर उठते हो। क्या हुआ? यह ऊर्जा कहाँ से आई है ? रात के सोने से इसका कुछ तो सम्बंध है। रात को जब मन शाँत होता है और ये एप्स भी नहीं होते तो आपका रास्ता खुल जाता है। कोई अवरोध नहीं बचता। आपकी अन्तर्यात्रा हो पाती है। आप अपने अचेतन मन तक की यात्रा पर जा पाते हो।

दिन में जिस काम को एप्स ना होने देते थे, मैगजीन्स ना होने देती थीं, गुरु का नाम ना होने देता था वह काम सोते में अपने आप हो गया। आपके भीतर जो ऊर्जा की नदी बहती है उसमें स्नान हो गया। कोई रोकने वाला ना था। बाहर के motivational preachers ना थे। बस आप थे और आप थे। मिलन हो गया। आपके प्यासे मन का और भीतर भरे ऊर्जा के भण्डार का मिलन हो गया। जब लौटे, जब सुबह उठे तो ऊर्जा से ओतप्रोत थे। वह ऊर्जा कहीं बाहर से ना आई थी आपके भीतर ही थी जिसे आपके बाहर अटकाने वाले एप्स ने ओझल कर दिया था। 

ऊर्जा से भरकर आप आनन्दित हो उठेंगे। रिसर्च में देखा गया कि सुबह के समय, नींद से उठने के बाद के समय लोगों को इन एप्स की जरूरत दोपहर और शाम के मुकाबले कम होती है। वे अपने केन्द्र से जुड़े होने के कारण ऊर्जा से भरे रहते हैं।

तो यह खोजना होगा कि ऊर्जा बाहर एप्स में है भुलावे में डालता है। आप ऊर्जा की खोज अपने भीतर ना करके बाहर करते हो यही आपकी ऊर्जा का क्षय करता है। यही आपको उदास करता है। अपने भीतर की ऊर्जा को ले लोगे तो ऊर्जा के अखंड भंडार से जुड़ पाओगे। उदास होने को कोई आधार ना बचेगा।

 

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