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कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

कालाधन सिर्फ काला नहीं होता

     
   
     

कालेधन को लेकर आजकल चर्चाएँ आम हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस पर एक उच्च अधिकार प्राप्त कमिटी गठित कर दी है। चुनावों से पहले बाबा रामदेव भी कालेधन को लेकर बहुत उत्साहित लग रहे थे। हालाँकि चुनाव उपराँत नरेन्द्र मोदी से उनके मतभेदों की कुछ खबरें आईं थीं। आम आदमी पार्टी ने भी इस बाबत कई बातें कहीं थीं जोकि अब सिर्फ बातें ही रह गई लगती हैं। इस प्रकार इस समय केवल मोदी ही कालेधन को लेकर अग्रिम पंक्ति में खड़े नज़र आते हैं।

जो भी धन स्थापित व्यवस्थाओं के उल्लंघन से हासिल किया जाता है वही काला धन होता है। सरल शब्दों में कहें तो बिना टैक्स चुकाए जो धन सरकार से छिपाया जाता है वह काला धन होता है। क्योंकि यह सरकार से छिपाया गया होता है इसलिए सरकार के पास इसकी मात्रा का सही पैमाना नहीं होता। इसका केवल अनुमान भर किया जा सकता है। इससे सरकारों को नुकसान यह होता है कि यह धन सरकार की विकास योजनाओं के लिए उपलब्ध नहीं होता बल्कि विकास की बजाय यह अपने स्वामी के व्यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति के लिये होता है।

यह देखा जाना उचित रहेगा कि कालाधन क्यों पनपता है? जब सरकार की नीतियाँ अस्थिर, शोषणकारी और दमनपूर्ण होंगी और सामाजिक सुरक्षा और दायित्वों के उसके साधन हर स्थान पर उपलब्ध नहीं होंगे तो भविष्य की सुरक्षा के लिए जनता का सक्षम वर्ग अपनी आय को छुपा लेता है और काले धन का निर्माण करता है। ऐसा भी संभव है कि आय उन साधनों से हुई हो जिन्हें सरकार ने प्रतिबंधित किया हुआ है। जैसेकि प्रतिबंधित वस्तुओं की बिक्री करके या घूस आदि लेकर। जब तक सरकार का रवैया उगाही के लिए अधिनायकवादी और जोर-जबरदस्ती वाला तथा दायित्वों के लिये टालमटोल वाला रहता है तब तक लोग काले धन को विपत्ति के समय त्राण देने वाला मानते हैं। सरकारी अध्यापक भी ऐसे समय के लिए ट्यूशन से कमाए धन को बचा कर रखता है। यह ट्यूशन की कमाई काले धन का ही एक प्रकार है।

काले धन के कई प्रकार हैं।

  • आम लोगों का काला धन
  • उद्योगपतियों का काला धन
  • राजनेताओं का काला धन
  • ब्यूरोक्रेट्स का काला धन
  1. आम लोग अपनी घोषित कमाई के अलावा भी एकाध काम जैसे – सुबह अखबार बेचकर, लिफाफे बना कर, छोटी मोटी मशीनें लगा कर, कोई टॉफी-बिस्कुट की दुकान खोलकर आदि करके कुछ कमाई कर लेते हैं और सरकार से छुपा लेते हैं। इस धन का मुख्य उद्देशय अपने सामाजिक भविष्य को सुरक्षित करना होता है। आकार में यह कालाधन इतना सूक्ष्म है कि सरकारें इस पर आमतौर से विचार भी नहीं करतीं।
  2. उद्योगपति अपने उद्योगों से होने वाली कमाई का पूरा ब्यौरा ना देकर कुछ काला धन कमाते हैं। कई बार इसका आकार बहुत बड़ा भी हो सकता है। उद्योगपति को इस कालेधन की जरूरत सरकारी बाबूओं, अधिकारियों और मजदूर नेताओं आदि की जरूरतें पूरी करने के लिये होती है। ये तीनों ही कभी भी किसी भी उद्योग को पंगु बना सकते हैं। इनकी बेपनाह मार से बचने के लिए उद्योगपति कालेधन से इनकी सेवा करता है और अपना उद्योग बचा कर रखता है।

    यदि किसी उद्योगपति के पास कुछ काला धन बच भी जाता है तो वह उसका इस्तेमाल नया उद्योग खड़ा करने में करता है जिससे अधिक उत्पादन और रोजगार पैदा होता है। भारत जैसी अधकचरी अर्थव्यवस्थाओं में यदि ऐसे काले धन को समाप्त किया गया तो यह उद्योगों के लिये ही विनाशकारी होगा। उद्योग तबाह हो जाएँगे। इस काले धन को समाप्त नहीं किया जा सकता।

  3. कालेधन का एक अन्य प्रकार राजनेता के पास होता है। अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके राजनेता लोगों के काम करवाता है और बदले में धन लेता है या सरकारी नियमों की मार से बचकर घूस आदि को बचा लेता है। यह राजनेता का कालाधन होता है। कई राजनेताओं को राजनीति में बचे रहने के लिए अनेक ऐसे जनकल्याणकारी कार्य करने होते हैं जिनके लिए सरकार से कोई धन प्राप्त नहीं होता। बाहरी दिल्ली का एक प्रसिद्ध युवा नेता अपने व्यक्तिगत पैसे से एक हजार के लगभग वृद्धाओं को मासिक पेंशन देता है। 
    राजनेताओं का कालाधन एक बुरे काम के लिए भी इस्तेमाल होता है। यह राजनीतिक अस्थिरता और कानूनी अराजकता के लिए भी प्रयोग किया जाता है। उस अवस्था में यह देश-समाज के लिए नुकसानदेह होता है। 
    राजनेताओं के काले धन के बहुमुखी इस्तेमाल की संभावनाओं के मद्देनज़र इसे पूरी तरह नष्ट करने की सोचना उचित नहीं होगा। राजनेताओं के कालेधन को नष्ट करने की बजाय इसे रेगुलेट करने की सोचनी चाहिए। इसे नियंत्रित किया जाना चाहिए।
  4. सबसे बुरा कालाधन ब्यूरोक्रेट्स का कालाधन होता है। यह धन आम आदमी के शोषण से पैदा होता है। ब्यूरोक्रेट्स का काला धन आम जनता की परचेजिंग पावर को घटा कर पैदा किया जाता है अतः यह बाजार के खिलाफ काम करता है। दूसरा यह उत्पादन को बढ़ाए विना ही बाजार में (काला)धन झोंक देता है अतः महँगाई को बढ़ाता है। यह ही वह कालाधन है जो स्विस बैंकों की पासबुकों के पृष्ठ सँख्याओं को बढ़ाता है। यही वह कालाधन है जिसको बढ़ाने के लिए बाबू और अधिकारी मिलकर आम जनता के कामों को रोकते हैं और कानूनों की अबूझ पेचीदगियाँ पैदा करते हैं। यह ही वह धन है जिसकी मात्रा अकूत होती है। आम आदमी इसी काले धन से त्रस्त होता है। इसी पर लगाम लगाए जाने की जरूरत है।

जब सरकार यह कहती है कि वह कालेधन के खिलाफ काम करना चाहती है तो उसे सबसे पहले तो अपनी सोच का फ़लक व्यापक करना होगा। सिर्फ़ एक या दो जजों की कमेटी से कुछ होने वाला नहीं है। क्योंकि कालेधन की समस्या कानूनी समस्या नहीं है सामाजिक समस्या है। कानूनों की पेचीदगियाँ तो सिर्फ कालेधन की दासियाँ हैं। जो कालाधन चाहेगा ये दासियाँ वैसा ही रूप धर लेंगीं।

कालेधन की समस्या पर काम करने के लिए सरकार को अपनी सोच स्पष्ट करनी होगी- कौन सा कालाधन? वह क्यों पैदा होता है? उसे पैदा करने में वर्तमान व्यवस्था के कौन से तत्त्व जिम्मेदार हैं? पूरी व्यवस्था में कौन से सुधार दरकार हैं जिनके बाद कालेधन की जरूरत ही ना रहे? इन सभी आधारों पर सोचकर ही कालेधन पर कुछ युक्तिसँगत कहा जा सकेगा।

इसी दिशा में एक सुझाव यह भी है जितना संभव हो कालाधन अनुमोदित, नियंत्रित या प्रतिवंधित किया जाए और शेष कालाधन जिस पर किसी भी प्रकार का कानूनी आचरण संभव नहीं है उसका राजनीतिक-सामाजिक उपयोग किया जाए। एक ऐसे कोष की संभावना पर विचार किया जा सकता है जो लगभग स्विस बैंको की तर्ज पर हो और जिसमें जमा करवाए गये धन के स्रोत के विषय में कभी भी ना पूछे जाने की गारँटी दी जाए। ऐसे अज्ञात-स्रोत वाले धन के स्वामियों को ब्याज ना दिया जाए बल्कि एक बहुत मामूली सी राशि उनके धन को हिफ़ाजत के साथ सुरक्षित रखनें के लिए उनसे ही ले ली जाए। बस सरकारी नियँत्रण इतना ही हो कि ऐसे जमाकर्ता एक निश्चित समय जैसे एक या दो वर्ष तक उस रकम को खाते में बनाए रखने का वचन दें ताकि सरकार के पास उस धन का एक निरंतर प्रवाह और निवेश बना रहे।

विचार और भी सँभव हैं। अनेकता में सँभव हैं। परन्तु उन पर आचरण किया जाना भी जरूरी है। 1980 के दशक में एक बार वसँत साठे ने एक भाषण में कहा था कि सोचने से इन्कार करना कायरता है। हिन्दुस्तानी कौम कायर नहीं है यह सोच सकती है नये विचार दे सकती है। सिर्फ इन्हें अब क्रियान्वित करने का समय आ गया है।

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