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Beyond Mind

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How to Avoid Annoying People

आपके चारों तरफ अनेक लोग सिर्फ आपको परेशान करने में ही लगे रहते हैं। वो आपकी बैक बाइटिंग करेंगे। काम में अड़ंगे डालेंगे, बॉस से शिकायतें करेंगे और झूठी अफवाहें फैलाएँगे। मानवीय मूल्यों की इन्हें परवाह नहीं होगी और ये आपको नीचा दिखाने के लिये किसी भी हद को पार कर जाएँगे। ये आमतौर से आपके सीनियर्स, आपके बॉसेज़, दबंग पडौसी, इलाके के दादा या ऐसे ही दूसरे लोग होते हैं।आप इनके सामने से इनसे नहीं टकरा सकते हैं क्योंकि ये लोग एक या दूसरे आधार परआपसे अधिक सुविधाजनक स्थिति में होते हैं। परन्तु इनसे निपटना भी जरूरी होता है वरना तो ये आपको जीने नहीं देंगे। आज ऐसे ही लोगों से निपटने के तरीकों पर जिज्ञासा करेंगे।

इनसे निपटने के दो तरीके हैः

- वह जो उन्हें रोकने के लिये हो, ये बाहरी तरीके हैं और

- वह जो आपकी सुरक्षा के लिये हो, ये आपके भीतरी तरीके हैं

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हमेशा जीत पाने के लिये

 

आपकी Energy का केवल 10% भाग ही आपके Conscious Mind से नियंत्रित होता है। यह 10% हिस्सा ही आपको आपके सारे काम करवा देता है। सब इसी 10% को लेकर अपनी सफलता की लड़ाईयाँ लड़ते हैं। उसी 10% से सभी कॉम्पीटीशन में भाग लेते हैं। टारगेट्स पूरे करते हैं। शोध कार्य करते हैं। पर्वतों पर विजय पाते हैं। यज्ञ करते हैं। ध्यान करते हैं। सब कुछ इसी 10% में कर लेते हैं।

अब जब भी आपको इन 10% वालों से आगे निकलना हो तो आपके पास एक ही विकल्प है इस 10% को बढ़ा कर किसी तरह 15% या 20% कर देना होगा। यदि केवल 10% Energy ही आपसे सभी खोजें, अन्वेषण और अभियान पूरे करवा लेती है तो यह बढ़ी हुई 15% या 20% Energy तो चमत्कार उपलब्ध करवा देगी। बस यही सूत्र है आज के इस प्रतियोगी विश्व में सबसे आगे रहने के लिये। यही सरप्लस Energy परीक्षा में आपको टॉप करवा सकती है। ऑफिशियल टारगेट्स पूरे करवा सकती है। यह दोगुना बढ़ी हुई आपकी भीतरी ऊर्जा आपको प्रतिष्ठित लेखक, वकील, इंजीनियर और आई टी एक्सपर्ट बना सकती है। और आप अपने समूह में सबसे आगे रह सकते हैं। आपमें ऊर्जा का विशाल भण्डार हिलोरें लेने लगेगा। आप थकेंगे नहीं, रुकेंगे नहीं और लक्ष्य से टलेंगे नहीं। आपके भीतर और उससे आपके बाहर एक क्राँति उपलब्ध हो सकेगी। सीधा सा सूत्र है – अपनी ऊर्जा के भण्डार को दुगुना कर देने से आप सुपरमैन बन सकेंगे। जो कहानियों में घटता था वह वास्तविक रूप से अवतरित हो पाएगा।

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The Life and the Logic


 

मन के लिये Logic सुविधाजनक है। Logical चीज विकल्प देती है। किसी एक को छाँटने की सुविधा देती है। जो A है वह B नहीं हो सकता। जो B है वह C नहीं हो सकता। क्योंकि यही तर्क है। यही Logical है कि सब स्पष्ट हो, अलग अलग हो। पहचान में गड़बड़ ना हो। यह सुविधाजनक है।तर्क या Logic समझ का विषय है। यह वस्तुओं, विचारों और बातों के बीच की consistency है, संगति है। यदि दिए गए Facts आपस में Consistent हैं तो आप उन्हें Logical मानते हैं। तर्क से बहुत मानसिक सुकून मिलता है। मन को सच्चाई पा जाने का संतोष होता है। मन को Logic में ही सत्य नजर आता है। यदि कोई बात Logical है तो आपको लगता है कि वही अंतिम सत्य है।

परन्तु जीवन में ठीक ठीक ऐसा नहीं है। A के B हो जाने में कोई समस्या नहीं है। पूरा काव्य प्रियतम के मुखड़े और चाँद के एक हो जाने में ही है। वही व्यक्ति किसी के प्रति महान आसक्त और वही व्यक्ति किसी दूसरे के प्रति पूरा विरक्त हो सकता है। एक ही व्यक्ति मे आसक्ति और विरक्ति एक साथ हो सकती है। ऐसे ही उसमें दानशीलता और कृपणता एक साथ हो सकते हैं। जो स्थान एक दृष्टिकोण से ठंडा होगा वही दूसरे दृष्टिकोण से गरम होगा। बर्फीले पहाड़ों में गर्म पानी का चश्मा हो सकता है। धूप और बारिश एक साथ हो सकते हैं। यहाँ जन्म है, मृत्यु है, सुख है दुख है। बचपन है बुढ़ापा है। बुढ़ापे में आदमी बचपन जैसा हो जाता है। यह अतार्किक हो सकता है लेकिन जीवन में होता है। जीवन तर्क के Logic के दायरे से बाहर तक फैला है। यह Logic से अधिक विस्तृत है।

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LABYRINTH MEDITATION

A labyrinth is almost a circular or an oval pattern of ways around a center. The paths proceed from the periphery to the center in a whirling manner. When a person moves along the path in a Labyrinth and reaches the center he is surprisingly calm and serene. His mind becomes quiet and peaceful.

Labyrinth meditation is an unusual meditational method. It is a rare combination of Yoga’s Pranayama, Sufi’s whirling and Osho’s Dynamic meditation. Whenever you feel helpless in abandoning your unruly thoughts you may choose Labyrinth Meditation. Its practice has a tremendous effect on the internal awakening. Even in these days the labyrinth meditation is practiced with a great success.

In this video we will discuss step by step procedure how to go for Labyrinth Meditation.

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ये गुरू लोग और खूँटों से बँधा मोक्ष

     
   
     

कल दो सम्भ्रांत महिलाओं से मुलाकात हुई। वे महिलाएँ अपने गुरू जी के दिल्ली आगमन पर लोगों को आमंत्रित करने में लगी हुईं थी। चर्चा के दौरान उन्होंने अपने दो गुरूओं के विषय में बताया। जो बड़े वाले गुरू हैं उनके बारे में बताया गया कि वे अनादि और अनन्त हैं। उनका ना जन्म हुआ है ना ही कभी मरण होगा। और जो छोटे गुरू हैं उनको बड़े गुरू द्वारा अपने संदेश फैलाने के लिये एक सुपात्र के रूप में चुना गया है। जब उनसे पूछा गया कि क्या स्वयं उन्होंने बड़े वाले अनादि और अनन्त गुरू को देखा है या किसी ऐसे व्यक्ति से मिली हैं जिन्होंने उन गुरू को अपनी आँखों से देखा हो। उनका उत्तर नकारात्मक था। उन महिलाओं ने बताया कि उनको बहुत लोगों ने महसूस किया है। उन गुरू को केवल महसूस किया जा सकता है वह भी उन लोगों के द्वारा जो गुरू के सत्सँग में शुद्ध हो गये हों।

 

1935 के बाद से वियना सर्किल और लॉजिकल पॉज़िटीविस्ट्स दार्शनिकों ने कहा था कि दर्शन की अनेक समस्याओं की हमारी भाषा के अशुद्ध प्रयोग से पैदा होती हैं अतः भाषा में केवल वही बातें कही जानी चाहिएँ जिनके अर्थ सब लोगों की समझ में एक जैसे आएँ। इससे अनेक दार्शनिक भ्रान्तियाँ दूर होंगी। वास्तव में इन्हीं दार्शनिक भ्रान्तियों को हम लोगों दार्शनिक समस्याओं का नाम दे दिया है। जबकि ये मात्र भाषा की अशुद्धियाँ है।

 

ऐसे किसी गुरू के अस्तित्व को कैसे साबित किया जा सकता है जो जीवित है, सशरीर है परन्तु दिखाई नहीं देता है? उस गुरू को देखने के लिये उसी विशिष्ट सम्प्रदाय के लोगों से सत्सँग लेना पड़ेगा और कितना सत्सँग गुरू को देख पाने के लिये पर्याप्त होगा – यह बात भी उसी सम्प्रदाय के लोग तय करेंगे।

 

यह कैसी शर्त है? यह कैसा सत्य है? जो इतना बाधित है। जिस सत्य को सभी लोग देख भी नहीं सकते वह यूनिवर्सल (सार्वभौम) होने का दावा कैसे कर सकता है? इन टुकड़ों में बँटे हुए सत्यों को लेकर कोई साधक कैसे एक यूनिवर्सल सत्य तक पहुँच सकता है? हर पाँच कोस पर एक गुरू का ठीया स्थापित है। हरेक गुरू – शिष्य – मँडल के लोग अपने गुरू से बाहर किसी अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पाते हैं। कई बार तो ये शिष्य – गण बिल्कुल कूप मँडूपों की तरह बर्ताव करते हैं।

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चमत्कार - Miracles

     
   
     

चमत्कार आपके देखने की वह अवस्था है जब आप वस्तुओं और विधियों को इस रूप में देखते हैं कि उनके भीतर के सम्बन्ध को नहीं देख पाते हैं।

इस अवस्था में आप वस्तुओं को देख पाते हैं, परन्तु उन विधियों को नहीं देख पाते हैं जिन विधियों से वे वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। यही मानसिक चकराव चमत्कार है। यह हमेशा देखने वाले की आँख में होता है। वही एक वस्तु या विधि किसी एक व्यक्ति के लिये चमत्कार हो सकती है जबकि किसी दूसरे के लिये जो उसके पीछे के परिदृश्य को देख समझ पा रहा है वह वस्तु चमत्कार नहीं हो सकती।

किसी एक व्यक्ति के लिये रेडियो चमत्कार हो सकता है। एक ऐसी वस्तु जो ना जाने बिना मुँह और जीभ के भी विभिन्न स्वर निकाल सकता हैं। संगीत प्रस्तुत कर सकता है और हर बात जानता है। डिब्बे की शक्ल का है फिर भी आवाज़ मनुष्यों की तरह निकाल सकता है। हे प्रभु सब तेरी माया है। टीवी और इन्टरनेट भी ऐसे ही अन्य चमत्कार हो सकते हैं।

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Love and Hate

LOVE AND HATE ARE THESIS AND ANTITHESIS

Every growth, growth as such, is dialectical. It needs thesis, antithesis, and synthesis; synthesis again in its turn becomes thesis, and creates antithesis and synthesis — which again, in its turn, becomes thesis.

That’s the way the whole existence works. That’s why you find duality everywhere. The duality is thesis and antithesis. One can remain caught between the two, divided, split; there will be no growth. One can make a bridge between the two, and create a new phenomenon: that is synthesis. One can remain at the synthesis; then growth stops there, unless this synthesis again functions as a thesis to produce antithesis, and so on.

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Being Beyond Mind

     
   
     

Your mind is a collection of memories and imagination. These memories are composed of largely of your experience. These experiences emanated from your senses. Therefore what you gathered through your senses is the basis of your experience.

When you make new permutations and combinations of your experiences using your cognitive faculties they become your imaginations. You may imagine a beautiful partner having nose like an actress, hair like that of a model and whose voice is similar to a radio jokey with a fervent of a known laureate. You may imagine all these things near a lake in Switzerland with a Chinese mountain in the background where you propose her offering a pack of fragrance invented by Moghul Emperor. This is all imagination. You can imagine it.

The problem with experience is that it is dead and cannot be recreated. The problem with imagination is that it exists only inside the brain and not on the ground. It cannot be acted upon. Experience is of the past and the imagination is mostly about the future. Both are non-existent. Both are useless.

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How to Enter Meditation

Meditation is a stage when you are in interview with yourself. When you are meeting yourself you are in meditation. It is as simple as that. All natural events are simple. These are the Pundits who make a thing complicated. Breathing takes place in a natural way; it takes place without mathematical calculations, without scientific theories and formulae. So is the happening of hunger, love, sleep and sex. All they just happen in the most simple manner.

They all become complicated and complex when it comes the turn of Pundits to explain them. They give theories, formulae and other explanations. Pundits make all simple things difficult. So they have done with Yoga and Meditation. The existence of Pundits is dependent on their making the things complicated. If they do not make the things difficult then nobody will go to them to seek their help. Pundits have a vested interest in complicating the things.

This time they have ‘Yoga and Meditation’ in their clutches. Yoga and Meditation are the most natural body poses and practices which keep the working of body parts in tandem with one another. Yoga brings one’s body and mind in conjunction. It adds nothing from outside. It just uncovers what is hidden there inside a person. One has to locate his real self. And that’s it.

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Your Existence is a risk to Society II

After its previous part Your Existence is a risk to Society I

But this society has tried to invent and develop a technique to tackle those spiritual incidents of the human consciousness. This technique is called psychology. This psychology gathers some information from the observations of the common man of the time and applies it to those who claim to have received the light. These observations are gathered from those members of the society which are the products of the teachings of the society. Their conduct and behaviour will conform to those social standards. The observations gathered from those persons would be in total conformity of the social values, stigmas, taboos, traditions etc.
 
When these observations are applied to those who get a glimpse of the light, who refuse to shed their originality and who revolt against the shackles of society these observations are bound to fail in their predictions. This psychology is insufficient to predict about the behavior of those Messiahs and Avatars. This psychology can predict about all Toms, Dicks and Harries but cannot predict about Guru Govind Singh, Oshos, Vivekanandas, Mansoors or Rabias.
 
Hence this psychology is nothing more than a social tool, again, used to maintain a streamline flow of social duplicity. This psychology is to tell about the conformity of behaviour of its subject against the behaviour of those who established it. For the societies it is indicative only regarding the potential problem areas of seething originality. This psychology discharges its duties as a watchdog of the society which created it. Only those are allowed to exist and cherished in a society who, are in accordance with the guidelines of the society. And those who are not, are vhemently opposed. Those who are originals are always opposed by the society.

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