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Beyond Mind

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Shayari

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नीदं शर्त नहीं ख्वाब देखने के लिये

उठो ये मंज़रे-शब ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख्वाब देखने के लिए

अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया
मेरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए

वो मर्हला है कि अब सैले-खूं पे राज़ी हैं
हम इस ज़मीन को शादाब देखने के लिए

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दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त दर्द से भर न आये क्यों

दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त दर्द से भर न आये क्यों?

रोयेंगे हम हज़ार बार, कोइ हमें सताए क्यों?

 

[संग = पत्थर, खिश्त = ईंट]

 

दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं

बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों?

 

[दैर = मंदिर, हरम = मस्जिद, दर = दरवाजा, आस्तां = मकान, रहगुज़र = रास्ता]

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मैं ख़्याल हूँ किसी और का

     
   
     

मैं ख़्याल हूँ किसी और का, मुझे सोचता कोई और है,

सरे-आईना मेरा अक्स है, पसे-आइना कोई और है।

 

मैं किसी की दस्ते-तलब में हूँ तो किसी की हर्फ़े-दुआ में हूँ,

मैं नसीब हूँ किसी और का, मुझे माँगता कोई और है।

 

अजब ऐतबार-ओ-बे-ऐतबार के दरम्यान है ज़िंदगी,

मैं क़रीब हूँ किसी और के, मुझे जानता कोई और है।

 

तेरी रोशनी मेरे खद्दो-खाल से मुख्तलिफ़ तो नहीं मगर,

तू क़रीब आ तुझे देख लूँ, तू वही है या कोई और है।

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दीवाने तेरे हुस्न के मारों में खड़े हैं

     
   
     

दीवाने तेरे हुस्न के मारों में खड़े हैं
तपते हुए पैरों से शरारों में खड़े हैं

तारों से फरोज़ां किये दुल्हन तेरी चूनर
हम डोली उठाए हैं कहारों में खड़े हैं

तालीम पे इस अह्द में इक आप का हक है
इस मुल्क में हम कब से गंवारों में खड़े हैं

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दिखावा है मुहब्बत का किसी की ऐतबारी क्या

     
   
     

दिखावा है मुहब्बत का किसी की ऐतबारी क्या
सभी हैं मस्त अपने में जमूरा क्या मदारी क्या

 

पठनवा ढूंडता फ़िरता लिए वो हाथ में लठवा
तू लम्बी तान के सोया, चुका दी है उधारी क्या

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ऐ फरोगे हुस्न तेरी दिलकशी ज़िन्दा रहे

 

     
   
     

ऐ फरोगे हुस्न तेरी दिलकशी ज़िन्दा रहे

ये अक़ीदत की फिजा ये बन्दगी ज़िन्दा रहे

 

जब उजालों की चमक में तीरगी ढलने लगी

चाँद चमका ताकि उस की चांदनी ज़िन्दा रहे

 

बेवफा वह क्या हुए चाहत न जीने की रही

फिर भी जीता इसलिए हूँ ज़िंदगी ज़िन्दा रहे

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