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Shayari

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जो मिल गई हैं निगाहें कभी निगाहों से

 

     
   
     

जो मिल गई हैं निगाहें कभी निगाहों से

गुज़र गई है मोहब्बत हसीन राहों से

 

चराग़ जल के अगर बुझ गया तो क्या होगा

मुझे न देख मोहब्बत भरी निगाहों से

 

बला-कशों की अँधेरी गली को क्या जाने

वो ज़िंदगी जो गुज़रती है शाह-राहों से

 

लबों पे मुहर-ए-ख़ामोशी लगाई जाएगी

दिलों की बात कही जाएगी निगाहों से

 

इधर कहा कि न छूटे सवाब का जादा

उधर सजा भी दिया राह को गुनाहों से

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झुका-झुका के निगाहें मिलाए जाते हैं

 

     
   
     

झुका-झुका के निगाहें मिलाए जाते हैं

बचा-बचा के निशाने लगाए जाते हैं

हुज़ूर जब से मेरे दिल पे छाए जाते हैं

ये हाल है कि क़दम डगमगाए जाते हैं

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रखना है तो फूलों को तू रख ले निगाहों में

 

     
   
     

रखना है तो फूलों को तू रख ले निगाहों में

ख़ुशबू तो मुसाफ़िर है खो जाएगी राहों में

 

क्यूँ मेरी मोहब्बत से बरहम हो ज़मीं वालो

इक और गुनह रख लो दुनिया के गुनाहों में

 

कैफ़ियत-ए-मय दिल का दरमाँ न हुई लेकिन

रंगीं तो रही दुनिया कुछ देर निगाहों में

 

काँटों से गुज़र जाना दुश्वार नहीं लेकिन

काँटें ही नहीं यारो कलियाँ भी हैं राहों में

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हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालिम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

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इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया

इश्क़ को जब हुस्न से नज़रें मिलाना आ गया
ख़ुद-ब-ख़ुद घबरा के क़दमों में ज़माना आ गया

 

जब ख़याल-ए-यार दिल में वालेहाना आ गया
लौट कर गुज़रा हुआ काफ़िर ज़माना आ गया

 

ख़ुश्क आँखें फीकी फीकी सी हँसी नज़रों में यास
कोई देखे अब मुझे आँसू बहाना आ गया

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हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है 

हुस्न जब इश्क़ से मन्सूब नहीं होता है
कोई तालिब कोई मतलूब नहीं होता है


अब तो पहली सी वह तहज़ीब की क़दरें न रहीं
अब किसी से कोई मरऊब नहीं होता है


अब गरज़ चारों तरफ पाँव पसारे है खड़ी
अब किसी का कोई महबूब नहीं होता है

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