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Shayari

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मेरा हुस्न-ए-नज़र है सब कुछ 

तेरा चेहरा न मेरा हुस्न-ए-नज़र है सब कुछ

हाँ मगर दर्द-ए-दिल-ए-ख़ाक-बसर है सब कुछ

 

मेरे ख़्वाबों से अलग मेरे सराबों से जुदा
इस मोहब्बत में कोई वहम मगर है सब कुछ

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कभी तो राहे-मुहब्बत में ये कमाल दिखे 


कभी तो राहे-मुहब्बत में ये कमाल दिखे
बिना बताये उसे मेरे दिल का हाल दिखे

 

बहार आती है तो फूल भी निखरते हैं
है दिल में प्यार तो गालों पे भी गुलाल दिखे

 

दिल उसकी सारी ख़ताएं मुआफ़ कर देगा
बस उस की आँखों में इक मरतबा मलाल दिखे

 

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गिला लिखूँ मैं अगर तेरी बेवफ़ाई का

गिला लिखूँ मैं अगर तेरी बेवफ़ाई का
लहू में ग़र्क़ सफ़ीना हो आशनाई का

ज़बाँ है शुक्र में क़ासिर शिकस्ता-बाली के
कि जिनने दिल से मिटाया ख़लिश रिहाई का

मिरे सजूद की दैरो-हरम से गुज़री क़द्र
रखूँ हूँ दावा तिरे दर पे जुब्बासाई का

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महबूब की खुशबु 

साँसों में मेरी भीनी खुशबु सी छा रही है
यादों के झूले पर तू मुझको झुला रही है

पाया है मैंने सबकुछ जो आज तक चाहा
दूरी मगर तुमसे मुझको रुला रही है

तंगदिल शहर में मैंने दड़बों को घर बनाया
गाँव की सुनी गलियाँ हर पल बुला रही है

दीखते है मुझको पग-पग नये-नये चेहरे
सूरत तेरी फिर क्यूँ मुझे इतना सता रही है

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरी महबूब न माँग

 

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

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रूठना मुझसे मगर खुद को सज़ा मत देना

 

 

रूठना मुझसे मगर ख़ुद को सज़ा मत देना

जुल्फ़ रूख़सार से खेले तो हटा मत देना

 

मेरे इस जुर्म की क़िश्तों में सज़ा मत देना

बेवफ़ाई का सिला यार वफ़ा मत देना

 

कौन आयेगा दहकते हुए शोलों के परे

थक के सो जाऊँ तो ऐ ख़्वाब जगा मत देना

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