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Spirituality

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WAY TO YOUR AWAKENING

 

अध्यात्म में बहुत संशय और संदेह हो गया है। आस्तिक दर्शन अजर और अमर आत्मा की बात करते हैं। बौद्ध लोग आत्मा और परमात्मा के सवाल पर मौन हो जाते हैं। जैनियों के लिये आत्मा शरीर के आकार के अनुसार छोटी बड़ी हो सकती है। आधुनिक वैज्ञानिक भी हैं जो संसार में सामने दिखाई पड़ता है उसी को सत्य कहते हैं। सनातनी हिन्दु लोग स्वर्ग और नरक की बातें करते हैं। वे मूर्ति पूजा की बात करते हैं, लेकिन नबीमूलक लोग मूर्तिपूजा को गलत कहते हैं। साँख्य दार्शनिक प्रकृति और पुरुष की सत्ता मानते हैं जबकि शंकराचार्य के वेदान्ती कहते हैं कि केवल ब्रह्म ही सत्य है बाकी सब मिथ्या है। गीता पढ़ने वाले विद्वान कर्मयोग को उत्तम कहते हैं जबकि विष्णु पुराण के पाठक भक्तियोग को सर्वोत्तम मानते हैं। विज्ञान भैरव ने ज्ञान को बेकार का बोझ बताया है जबकि शिवसंहिता में ज्ञान की अनन्तता की बात कही गई है। विवेकानन्द सांसारिक कल्याण के लिए अध्यात्म के उपयोग की बात करते हैं जबकि ओशो वैयक्तिक जागरण का आह्वान कर रहे हैं। सामान्य जन के लिये बहुत ऊहापोह है Confusion है। स्पष्ट नहीं है कि क्या किया जाना है।

जहाँ से मैं देख पाता हूँ वहाँ से लगता है कि ये सब सत्य उन मनीषियों के द्वारा देखे जाने वाले भिन्न भिन्न शिखर हैं। जो बुद्ध ने देखा वह जीसस से अलग देखा। जो मुहम्मद ने देखा वह महावीर से अलग है। जो विवेकानन्द ने देखा वह अष्टावक्र से भिन्न है। इसलिये इन देखे गये सत्यों से आपको कुछ ना मिलेगा। वे पहले ही देखे जा चुके हैं। पुराने हो चुके हैं। उन्हें फिर फिर देखने से केवल पुनरुक्ति हो जाएगी। जो इन्होंने देखे वह इन मनीषियों के सत्य थे। आपका सत्य इनसे भिन्न हो सकता है। क्योंकि आप इन मनीषियों से भिन्न हैं। सत्य कभी पुराना नहीं है मैला नहीं है। वह हमेशा नया मिलेगा। इसलिये जब भी आप खुद को इन पुराने रास्तों पर बाँध लोगे तो आपके सत्य तक ले जाने वाला आपका व्यक्तिगत रास्ता भूल जाएगा।

आपका सत्य आपका व्यक्तिगत सत्य है। यह बिल्कुल नया है। उस पर आज तक कोई नहीं गया है। आप के बाद भी उस पर कोई ना जा पाएगा। आप पहले और अंतिम व्यक्ति उस पर जाएँगे। अगर आप ने खुद को किसी पुराने रास्ते पर बाँध लिया तो आपकी निजता का रास्ता तलाशने की सब संभावनाएँ समाप्त हो जाएँगी। वह पुराना रास्ता आपको कहीं ना ले जा पाएगा। पुराने रास्ते से नए सत्य को तलाशना असंभव है। यह एक चूक है।

आपने क्या कभी देखा कि महावीर किसी दूसरे के रास्ते चले? क्या राम या कृष्ण कभी दूसरे के रास्ते चले? या जो भी महावीर के रास्ते चले, वे कभी महावीर बन पाए? राम या कृष्ण बन पाए? यदि हजारों वर्षों में ऐसा ना हो पाया तो आपके साथ हो पाएगा और आप बुद्ध, जीसस या विवेकानन्द बन पाएँगे – इसकी क्या गारन्टी है? और अगर किसी तरह कर करा के आप बन भी गए तो क्या महत्त्वपूर्ण घटित होगा? आप तो मात्र एक डुप्लीकेट पीस से ज्यादा कुछ हो नहीं पाओगे। क्या आप एक डुप्लीकेट भर हो जाने के लिये ही सब उपक्रम करना चाहते हैं। तब तो आप इस अनमोल जीवन को बहुत सस्ते में दाँव पर लगा रहे हैं। एक बार फिर सोच लीजिए।

ये पहले से बने बनाए रास्ते आपको बहुत ललचाते हैं। ये चमकदार जो हैं। महावीर, बुद्ध, राम, कृष्ण, जीसस और विवेकानन्द इन पर चले हैं। ये अवश्य ही सुन्दर मार्ग होंगे। पर ये आपके मार्ग नहीं हैं। ये आपके लिये नहीं हैं। ये जिनके लिये थे वे इन पर चले। मंजिल को पहुँचे। आपका रास्ता अलग है। यह आपकी निजता से निकलेगा। आप अपना मार्ग खुद तलाशना होगा। वही आपकी खोज होगी। जिस दिन आप अपनी मंजिल को और अपने मार्ग को तलाश लेंगे उस दिन आप स्वयं ऋषि हो जाएँगे। फिर आप जो भी वक्तव्य दोगे, आपका वह वक्तव्य उपनिषद् हो जाएगा। आपका कहा हुआ वाक्य आप्तवाक्य कहलाएगा।

स्वयं की खोज से पहले कोई सत्य जाना नहीं जा सकता। जो भी आप आत्मा, परमात्मा या प्रकृति के बारे में कहते हैं वह दूसरे के वक्तव्य को दोहरा रहे हैं। जो भी आप कहते हैं वह Hearsay बात है, सुनी सुनाई, रटी रटाई कहानी है। जो बात दूसरों ने आपको बताई थी, उसी का रिपीटीशन है। आपकी आत्मा, आपका परमात्मा यह एक कहानी से ज्यादा सत्य न होगा। यह तो दूसरों के द्वारा दी गई सूचना भर है। बिना तस्दीक के, Unverified.

पर यह सत्य का मार्ग कहाँ से आएगा? यदि दूसरों के बताए ना आएगा तो फिर कैसे आएगा ? यह आपको स्वयं ढूँढना होगा। इतना आसान नहीं है। कबीर कहते हैं कि जो घर फूँके आपनो वो चले हमारे साथ। इससे कम कीमत पर ईश्वर को, आत्मा को उपलब्ध करवा देने वाले लोग गंभीर लोग नहीं है। आत्मा और परमात्मा को पाना है तो उनसे जुगत मत बैठा लेना। ये मानव सभ्यता के हजारों सालों को बर्बाद कर देने वाले लोग हैं। पाखण्ड बेचते हैं। इनसे सावधान रहना होगा। सिर्फ अपने पे भरोसा करना होगा। आपसे अधिक Authentic कोई दूसरा नहीं हो सकता। दूसरों का सत्य पुराना पड़ चुका है। ?

इस खोज के लिये आपको अपने भीतर जाना होगा। और अकेले ही जाना होगा। दूसरे के साथ में जाने का कोई उपाय नहीं होगा। अधिक से अधिक कोई दूसरा कोई गुरू कोई गाईड इतना कर सकता है कि आपको हल्का सा इशारा भर कर दे कि उस तरफ वहाँ कुछ है। बाकी तलाश आपकी होगी। दूसरे की तलाश और उनके द्वारा प्राप्त परिणाम आपको केवल चकाचौंध से भर सकते हैं प्रकाशित नहीं कर सकते हैं। जब भी आप प्रकाश चाहेंगे तो भीतर की यात्रा पर स्वयं चलना होगा। यह आपकी साधना का प्रारम्भिक बिन्दु होगा। पर Authentic होगा। इस प्रारम्भिक बिन्दु पर पहुँच पाना ही उपलब्धि है।

यह पूरी Video Youtube के Light in Life by Pratap Shree चैनल पर उपलब्ध है। नीचे दिये लिंक को क्लिक करके आप इस चैनल पर पहुँच सकते हैं।

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तंत्र और योगः एक तुलनात्मक अध्यन

किसी व्यक्ति के जीवन में दो अवसर महत्त्वपूर्ण होते हैं। पहला अवसर उसके जन्म का होना है। दूसरा अवसर यह पता लग जाना है कि जन्म क्यों हुआ है? जन्म वाला पहला अवसर आपको मिलने वाला प्रसाद है। पहला महत्त्वपूर्ण अवसर आपको दूसरों की कृपा से मिलता है। दूसरा अवसर आपके द्वारा अर्जित की जाने वाली उपलब्धि है। यह दूसरा अवसर आपको खुद तलाशना है।

दूसरे अवसर की तलाश के बिना भी काम चल सकता है। इसे तलाशने की कोई Compulsion नहीं है। कीट पतंगों की तरह, मवेशियों की तरह आहार निद्रा भय मैथुन के चक्र में रहा जा सकता है। कोई को इससे परेशानी नहीं होने वाली है। लेकिन एक अन्य विकल्प भी है। इस चक्र से बाहर निकल कर चेतना की ऊँचाईयों को भी छुआ जा सकता है। यह आपकी Choice है।  यह आपका अधिकार है कि आप कौन सा जीवन चाहते हैं। केवल Animalistic existence का या पूर्ण चेतना के शिखर पर चमचमाते व्यक्तित्व का।

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Meditation and Orgasm

     
   
     

The experience of orgasm itself is always nonsexual. Even though you have achieved it through sex, it itself has no sexuality in it.

You can reach to orgasm through sex. It is a merger of the negative and the positive polarities -- such a deep merger that the man is no longer man, the woman is no longer woman. They are not two; there is only one energy surrounding them both. They have melted into that energy.

It may be for a moment -- that does not matter -- but the experience itself has nothing to do with sex.

The first orgasm is bound to be attained through sex. And my own understanding is that meditation has grown out of the experience of orgasm, because the original founders -- particularly Shiva who, in his Vigyan Bhairva Tantra, has written, just like a scientific formula, about one hundred and twelve meditations; each meditation just in one line or two lines.... The man is tremendously aphoristic. Those one hundred and twelve sutras are just like seeds. He has condensed everything about the method in them.

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Tantric Meditation can solve sexual problems

     
   
     


Everyone has heard of tantric meditation and that it also has a sexual aspect to it as well.

Tantric meditation has yoga influences. You meditate as with other meditation techniques by sitting peacefully and calmly, easing your mind and ridding yourself of thoughts.

The meditation is supposed to relax, renew and awaken the person’s spirit and body. Because of the meditation, people who perform it find that they have less sexual problems.

The Chinese Tao philosophy also has a branch where Taoist spiritual sexuality uses some of tantric teachings. The Taoist philosophy concentrates on the fundamental responses and processes of the body beyond the instinct and reaction.

They say that desire and passion go beyond just sex but influences our daily lives. By practicing tantric meditation, we return to the primal part of us and learn to find desire once again and accept it.

It gets rid of sexual problems without the use of medication and drugs. As you age, the problems with your life and body during your lifetime can cause you to have a number of sexual problems. Impotency, lack of desire, and pain are a few examples of what people go through every day. It has been shown that tantric meditation can help with sexual problems.

The meditation asks you to calm your body and mind, to focus in on love, the life force that fuels the body. As you progress through the meditation, it clears your perception, helping you to handle your issues in your life, not just sexual frustrations.

It has been shown that the body can and will cure itself with minimal outside influences. By concentrating and relaxing, the body can release and activate hormones that spur on desire. This meditation can also clear the mind of any insecurity that cause many of the sexual problems found today.

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 विज्ञानभैरव – एक मुक्ति द्वार

                                                                                                           – प्रताप 

     
   
     

आज का समय सपनों का समय है। हर एक व्यक्ति ने एक स्वप्न पाल रखा है। वह व्यक्ति उस स्वप्न के पीछे पड़ा है। स्वप्न जागने और सोने के बीच का समय होता है। स्वप्न न तो पूरी तरह जागरण होता है और न पूरी तरह सुषुप्ति होता है। स्वप्न जागरण और सुषुप्ति का संक्रमण काल है। जागरण और सषुप्ति की सांध्यवेला को स्वप्न कहा गया है। यही स्वप्न की मोहकता है कि इसमें जागरण का यथार्थ और सुषुप्ति की मूर्छा दोनों नहीं हैं परन्तु जागरण की अनुभूति और सुषुप्ति की विश्रांति दोनों इसमें हैं। 

आज मनुष्य का मन व्यथित है । वह आराम नहीं कर पाता है। मोबाईल की घंटी बजकर नींद तोड़ देती है। न बजे तो भी नींद नहीं आती कि पता नहीं क्यों नहीं बज रही है, इतनी देर में तो बहुत बार बज जाया करती थी । न घंटी बजने से चैन है और न ही न बजने से ।मन दुविधा से भरा है । नींद आ भी गई तो सो नहीं पा रहा है। सोते समय भी दफ़्तर, टैंडर, काऊन्टर, बॉस, टारगेट सब मौजूद हैं। स्वप्न में माल का ऑर्डर भिजवाया जा रहा है। मुनीम का चेहरा दिखाई दे रहा है। नींद उचट रही है। निद्रा मे जागरण घुस गया है। जब सोते समय सो नहीं पाया तो जागते समय जाग भी नहीं पाता है। अधूरी नींद लिये टारगेट पूरा करने के लिये दौड़ पड़ता है। टारगेट सोने नहीं देता है, नींद जागने नहीं देती है। सब कुछ घालमेल हो जाता है। आज का मनुष्य न जागता है न सोता है। जागने और सोने के बीच का स्थान स्वप्न का है। आज का मनुष्य स्वप्न में जीवित है। परन्तु यह स्वप्न यथार्थ और मूर्छा वाला है चेतना और विश्राँति वाला नहीं है।

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रोग, भोग और योग के आढ़तिये

 -- प्रताप 

     
   
     

चारों तरफ़ गुरुओं की धूम मची है। हर विपणक के यहाँ योग से सम्बन्धित सामग्री बिक रही है। चारों ओर आढ़त का बाजार लगा है। लोग योग बेच रहे हैं  कुछ अन्य लोग योग खरीद रहे हैं। कोई आसन बेच रहा है, कोई अच्छे वाले आसन ईजाद कर रहा है। कोई ध्यान के सस्ते दाम लगा रहा है। किसी दुकान पर कुण्डलिनी उठवाई जा रही है। कुछ लोग प्राणायाम बेच रहे हैं। बता रहे हैं कि माल अच्छा है, साथ में गारन्टी दे रहे हैं कि मोटापा कम कर देगा। इस ध्यान- योग के बाजार में कुछ दुकानों पर एक्सेसरीज़ भी बिक रही है। ज्यादा भीड़ उन दुकानों पर है जहाँ एक्सेसरीज़ या तो हर्बल है या फिर उन्हें आयुर्वेद में से कहीं से आया बताया जा रहा है। पूरे बाजार  में चहल पहल है। चतुर सुजान, उत्तम वस्त्र पहनकर दुकानों के काउन्टर पर विराजे हुए हैं। मुद्राओं को रेशमी थैलियों में बन्द करके नीचे सरका रहे हैं। कुछ लोग वहाँ दूर शेड के नीचे बैठे हैं। बिल्कुल चुप । पूछा - कौन हैं ? पता चला - बुद्धिजीवी हैं।

सवाल हाट के अस्तित्त्व पर नहीं हैं। हाट को तो होना ही है, यहाँ नहीं होगा तो कहीं और होगा। जब तक क्रेता  का थैला और विक्रेता का बटुआ है, भिन्न भिन्न स्पेस टाईम में हाट अवतरित होता रहेगा। यह अनिवार्य है। सवाल दुकानों पर तथा माल पर भी नहीं हैं। हाट है तो अच्छा, भला, बुरा सभी तरह का माल भी सप्लाई होगा ही। वणिक नियमों के तहत् गंजों को भी कंघी बेचने के प्रयास तथा इन प्रयासों में सफलता-असफलता सभी कुछ होगा। कभी कंघी बिक जाएगी और कभी नहीं भी बिकेगी। कंघी के कारीगर, आढ़तिये सब अपना अपना हिस्सा कैलकुलेट करते रहेंगे। बाजार का व्यापार यूँ ही चलता रहेगा। व्यापार को यूँ चलाना बाजार की फ़ितरत है। फ़ितरत पर सवाल नहीं खड़े किये जा सकते हैं। सवाल तब उठते हैं जब कोई अपनी फ़ितरत के खिलाफ़ काम करता है। 

गंजे को कंघी बेचना वणिक चतुराई है। बाजार इस चतुराई की नींव पर ही खड़ा होता है। परन्तु बवासीर के रोगी को कंघी बेचना मैलप्रैक्टिस (महाठगी) है। ऐसे में बुद्धिजीवियों को उठ कर हस्तक्षेप करना चाहिये । ऐसे ठगों और ठगी के खिलाफ़ प्रतिरोध बुद्धिजीविय फ़ितरत है। आज का सवाल है कि अपनी फ़ितरत के बरख़िलाफ़ ये बुद्धिजीवी शेड के नीचे चुपचाप क्यों बैठे हैं। 

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