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तंत्र एवँ योग की तुलना

तंत्र और योगः एक तुलनात्मक अध्यन

किसी व्यक्ति के जीवन में दो अवसर महत्त्वपूर्ण होते हैं। पहला अवसर उसके जन्म का होना है। दूसरा अवसर यह पता लग जाना है कि जन्म क्यों हुआ है? जन्म वाला पहला अवसर आपको मिलने वाला प्रसाद है। पहला महत्त्वपूर्ण अवसर आपको दूसरों की कृपा से मिलता है। दूसरा अवसर आपके द्वारा अर्जित की जाने वाली उपलब्धि है। यह दूसरा अवसर आपको खुद तलाशना है।

दूसरे अवसर की तलाश के बिना भी काम चल सकता है। इसे तलाशने की कोई Compulsion नहीं है। कीट पतंगों की तरह, मवेशियों की तरह आहार निद्रा भय मैथुन के चक्र में रहा जा सकता है। कोई को इससे परेशानी नहीं होने वाली है। लेकिन एक अन्य विकल्प भी है। इस चक्र से बाहर निकल कर चेतना की ऊँचाईयों को भी छुआ जा सकता है। यह आपकी Choice है।  यह आपका अधिकार है कि आप कौन सा जीवन चाहते हैं। केवल Animalistic existence का या पूर्ण चेतना के शिखर पर चमचमाते व्यक्तित्व का।

एक उपाय योग का है। अन्य उपाय तंत्र का है। योग आपको आठ अंगों की एक टूल किट देता है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि – ये आठ टूल्स हैं। और ये आठ Stages भी हैं। हर एक टूल आपको Refine करके अगली Stage तक पहुँचाता है। यम नियम आपको आसन की अवस्था के लिए तैयार करते हैं। आसन आपको प्राणायाम के लिए तैयार  करता है। यदि पहली अवस्था को ठीक से उपलब्ध ना हो पाओगे तो अगली अवस्था में मुश्किलें आएँगी। वह अगली अवस्था मिल ना पाएगी।

तो योग आपको एक Hierarchical ऊँचाई पर ले जाता है। हर एक मुकाम अपने से पहले मुकाम की चोटी पर स्थित है। यह एक आठ मंजिल बिल्डिंग के जैसा है। छठी मंजिल पर जाने के लिए पाँचवी को पार करना ही होगा। आठवीं मंजिल की छत पर आप समाधि को प्राप्त हो पाएँगे। सब कुछ बहुत Systematic है। जरा भी इधर उधर हुआ तो आप चूक सकते हैं। अनेक साधक जीवन भर लगे रहे पर समाधि नहीं पा सके।

परन्तु तंत्र कुछ अलग है। इसमें कोई Hierarchy नहीं, कोई पहला और बाद वाला नहीं। सब कुछ है सब जगह है। कुछ ऐसा नहीं जो प्राप्त करना हो। जो है बस सब आप हो। यहीं हो और अभी हो। कहीं अलग नहीं जाना है। तंत्र में मंजिल जैसा कुछ नहीं। कहीं जाना नहीं है। बस करना है। और करना भी कुछ विशेष नहीं है। किसी विशेष प्राप्ति के लिये कहीं जाना नहीं है। बस जो हो रहा है, अपने आप हो रहा है उसे होने दो और उसके प्रति जाग जाओ। जो हो रहा है उसके प्रति जाग जाना ही तंत्र है।

तंत्र विधियों का एक पूरा सैट है। शिव ने इसके बारे में बताया है। शक्ति को बताया है।

     
   
     

शक्ति शिव से पूछ रही हैं कि ‘हे  शिव,आपका सत्य क्या है? आप कौन हैं? आश्चर्यों से भरा हुआ ये विश्व क्या है? इस विश्व का केन्द्र क्या है? अलग अलग forms में, रूपों में दिखने वाला यह जीवन क्या है? इन Forms और रूपों के परे यह जीवन क्या है? Time and Space के उस पार जो सत्य है उसको हम कैसे जानें? मेरे संशय निर्मूल करें|’

यह ऐसा है जैसे कि देवी पूछ रही हों कि प्रभु गुड़ क्या है? और शिव बता रहे हैं कि अलमारी खोलो जो भूरे रंग का पदार्थ है उसको कुछ भाग मुँह में लेकर अनुभव करने से आप गुड़ की मधुरता को ले पाएँगे। शिव कहीं भी गुड़ का metaphysical analysis नहीं करते। वे गुड़ चखने की विधियाँ देते हैं। आपके स्वभाव, आपके अस्तित्व, आपकी आयु, आपकी परिस्थितियों के अनुसार वे सैंकड़ों विधियाँ देते हैं। ये विधियाँ ही तंत्र हैं।

योग में आपको अलग करने की जरूरत है। योगी का जीवन सामान्य गृहस्थ के जीवन से अलग होना होगा। वह साधना के अनुकूल होना होगा। यदि पद्मासन किया जाना है तो एक Standardised काम किया जाना है। Standardised नहीं होने से वह कुछ भी होगा पर पद्मासन नहीं होगा। योग में Standardisation का बड़ा महत्तव है। तंत्र को अलग से किसी Standardisation की कोई जरूरत नहीं है। जो हो रहा है वही मार्ग बन जाता है। आपके साँसें, आपका भोजन, आपका स्नान, आपका खेल, आपका सिनेमा देखना, गहरी खाई में देखना, ऊँचे रोलर कोस्टर से उतरना, प्रेमी या प्रेमिका से मिलना या पुराने मिलन को याद करना, खाली आकाश को घूरना या कुछ भी करना तंत्र में एक उपाय बन जाता है। आप इनमें से कुछ भी करके अपने आप को अपने बोध को जगा सकते हैं।

तंत्र की कुछ विधियां श्वास पर आधारित हैं, कुछ विधियां शरीर पर उसके अंगों पर आधारित हैं| कुछ विधियां आपकी कल्पना का उपयोग करती हैं। यहां पर आपके मन के लिए स्थान है। आपके स्वप्नों के  लिए स्थान है। ये विधियां बतलाती हैं आंख, नाक, कान, जीभ या त्वचा किसी भी Sense को रास्ता बनाकर परम सत्य तक पहुंचा जा सकता है। जो जो Sense आपके मन को बनाती है वही वही Sense आपको मन के पार भी ले जाती है।

योग में सरलता जैसा कुछ नहीं है। हर एक सीढ़ी एक उपलब्धि है। उसे पाना है और फिर बनाए रखना है – इसमें Effort शामिल रहता है। योग में हर चरण में एक Effort है। तंत्र में Effortlessness है। बल्कि कहा जाए तो Effortlessness ही तंत्र है। Effort हुआ तो तंत्र नहीं हो पाएगा। तंत्र एक Flow of Life है।

तंत्र आपके अस्तित्व से जुड़ी हर चीज का उपयोग करता है। कामना, भय, क्रोध - सबकाष जो कुछ आपके पास उपलब्ध है, तंत्र उसी का इस्तेमाल आपको जागृत करने के लिये करता है। इसीलिए कुछ विधियां इतनी सहज हैं कि अगंभीर लोगों को ये कोई मज़ाक सा लगेगा। एक विधि में शिव कहते हैं- ‘जब छींक आने वाली हो, जब तुम डरे हुए हो, किसी गहरी खाई में झांक रहे हो, युद्ध से भाग रहे हो, जब चरम जिज्ञासा तुम्हारे मन में हो, भूख के आरम्भ में और भूख के अंत में हमेशा जागृत बने रहो

तंत्र किसी भी चीज का विरोध नहीं करता। वह नहीं कहता कि मदिरा बुरी है। वह नहीं कहता कि काम बुरा है। तंत्र नहीं कहता कि  क्रोध मत करो। तंत्र कहता है कि क्रोध को उठने दो और उस दौरान मन और शरीर में जो कुछ घट रहा है उसे चुपचाप देखो और तुम अपनी ऊर्जा के केंद्र में पहुंच जाओगे। तंत्र आपको उपदेश नहीं देता कि ‘डरो मत’। तंत्र कहता है कि अगर डर लगता है तो अपने डर से लड़ो मत, उसे दबाओ मत, बहादुर बनने की कोशिश मत करो। भय में शरीर कांपता हो तो कांपने दो और जो कुछ हो रहा है उसे होने दो, बस उसे होश के साथ उसे देखते रहो।

आज के जीवन में जहाँ बेशुमार काम हैं फुर्सत नहीं है, दम लेने का वक्त नहीं है तो योग के लिए समय निकालना असंभव सा हो गया है। इसीलिये गिने चुने लोगों को छोड़ दें तो आजकल योगी दुर्लभ हो गये हैं। लेकिन तंत्र में इसका भी उपाय है। आपका बॉस आपको डाँट रहा है, या बॉस के रूप में आप किसी को डाँट रहे हैं, ट्रैफिक जाम में फँसे हैं, उधार माँगने वाला दरवाजा पीट रहा है, नया फोन खरीदने के लिये मन बेचैन है, पुराने दोस्त ने दगा कर दिया है, मकान मालिक ने सामान उठा कर सड़क पर फेंक दिया है तो आप उसका उपयोग तंत्र में कर सकते हैं। ये बुरे से लगने वाले हालात ही आपके लिये मुक्ति का सही साधन बन जाएँगे। बस इनका उपयोग सीख लेना है। तंत्र आपको सिखाएगा कि कैसे ये सामान्य से लगने वाली बातें भी आपकी ऊर्जा को ऊपर उठा सकती हैं। इस तरह तंत्र ही आपको आधुनिक समस्याओं से मुक्ति दिलाने का सही उपाय है।

तंत्र ने हजारों विधियाँ दी हैं। विज्ञान भैरव ने उनमें से 112 विधियों को संकलित किया है। परन्तु इसके अलावा भी विधियाँ हैं। बल्कि सही तो यह है कि जितने तरह के आप हैं, आपका स्वभाव है उतनी ही तरह की विधियाँ आपके लिये उपलब्ध हैं।

तंत्र आपके Transformation का एक Solution है। यदि आप तंत्र का आश्रय लेते हैं तो निश्चय ही यह आपको निराश नहीं करेगा।

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